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मानसी

मन में कविता रचना

कश्चिद् व्यञ्जनाक्षरै: पद्मोत्पलाद्याकृतिभिर्यथास्थितानुसार, विसर्जनीय युतै: श्लोकमनुत्तार्थंलिखति । सा दृश्यादृश्यभेदविषया द्विधा ।

अर्थात् बिखरे अक्षरों से कमलादि आकृति के श्लोक बनाना। यह खेल और स्पर्धा दोनों रूपों में होता है। मानसी एवं क्रियाकल्प, ये दोनों कलाएँ परस्पर आश्रित एवं एक दूसरे की पूरक हैं। काव्य रूप में लिखने से पूर्व मन में उसके विषय में सोच–विचार करना नितांत आवश्यक है। मन में सोची गई बात को ही शब्दों द्वारा अभिव्यक्ति दी जाती है। क्रियाकल्प वास्तव में काव्य शास्त्र का ज्ञान है जिसके बिना मानसी को स्वरूप नहीं दिया जा सकता। वास्तव में मानसी ऐसे काव्य की क्रिया है जिस काव्य को विभिन्न बन्धों में लिखा जा सकता है, जैसे मुरजबन्ध, पद्मबन्ध, नागबन्ध के श्लोक। मानसी अर्थात् मन द्वारा मन में काव्य की रचना और क्रियाकल्प का तात्पर्य है– शब्दों द्वारा उस विमर्श को व्यवस्थित और अलंकृत रूप में अभिव्यक्त करना। श्रीकृष्ण के जीवन में ये दोनों कलाएँ अत्यंत विकसित रूप से रासपञ्चाध्यायी ( चौथे अध्याय) में है, जो श्रीकृष्ण ने गोपियों के प्रश्न के उत्तर में कहा है, वह इस कला में उनके अगाध ज्ञान के ज्वलंत प्रमाण हैं–

नाहं तु सख्यो भजतोऽपि जन्तून् भजाम्यमीषामनुवृत्तिवृत्तये । यथाधानो लब्धधने विनष्टे तच्चिन्तयान्यन्निभृतो न वेद ।॥20 ॥
न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि व: । या मा भजन् दुर्जरगेहशृङ्खलाः संवृश्च्य तद्बः प्रतियातु साधुना ॥22 ॥
– ( श्रीमद्भागवत पुराण, श्रीमद्भा., 10/32/20–22 )

श्रीकृष्ण कहते हैं– हे सखियों ! मैं तो सानुराग प्राणियों से भी प्रेम नहीं करता। उनकी मनोवृत्ति निरंतर मुझसे लगाये रखने के लिए है, जिस प्रकार एक धनहीन दरिद्र प्राणी मिले हुए द्रव्य के नष्ट हो जाने पर उसी चिंता में डूबा हुआ अन्य किसी वस्तु का चिंतन नहीं करता। यहाँ अनुवृत्तये कहकर भगवान ने अनुवृत्ति पद से कारण बताया है कि मेरे भक्तों के मन की वृत्तियाँ मुझमें लगी रहे, यही एक मात्र कारण है कि मैं प्रेम करने पर भी प्रेम नहीं करता।

श्रीकृष्ण कहते हैं– हे गोपियों ! इस प्रकार मेरे लिये लोक मर्यादा, वेद प्रतिपादित मार्ग और अपने संबंधी जनों का त्याग करने वाली तुम लोगों की मनोवृत्तियाँ लगी रहे, इसीलिये मैं तुम्हारी आँख बचाकर तुम्हारे मधुर प्रेम का आस्वादन करते हुए अदृश्य हो गया था। हे गोपियों ! अपने प्रिय के लिये इस प्रकार असूया करना उचित नहीं है। जिन्होंने अत्यंत कठिनता से तोड़ी जाने वाली गृहस्थ की श्रृँखलाओं ( जंजीरों) को तोड़कर मुझे भजा है, तुम लोगों का मेरे साथ मिलना सवर्था दोषशून्य है। तुम्हारे मेरे प्रति इस प्रेम कर्म का बदला तो मैं देवताओं की सी आयु सीमा पाकर भी नहीं कर सकता हूँ, इतना मैं तुम्हारा ऋणी हूँ। यह काव्य कितना अर्थ गर्भ है, यह विचार करने में काव्य मनीषी भी पूर्ण रूप से समर्थ नहीं हो पाते।