कामसूत्र के अनुसार बालक्रीड़नक कला की व्याख्या इस प्रकार है–
गृहकंदुक पुत्रलिकादिभि: बालानां क्रीड़नानि ।अर्थात् बच्चों के खेलने के लिये पुत्तलिका आदि का निर्माण करने एवं बाल क्रीड़ाओं में कुशलता।
बाल्यावस्था में क्रीड़ाएँ बालकों का मनोरंजन करती हैं, किंतु युवा एवं प्रौढ़जन भी उन खेलों में बालकों के साथ आनंद उठाते हैं। कहा गया है कि पुत्र को अर्थात् संतान को गोद में लेकर उसका आलिंगन करना, अमृत के आस्वादन जैसा होता है। इसी कला के अंतर्गत कंदुक और पुत्तलिका के निर्माण, खेल और उसमें कुशलता परिगणित है।
श्रीकृष्ण ने बचपन में ऐसे कई खेल तो खेले ही थे, पर एक घटना विशेष है जो उनके बालक्रीड़नक कला में विशेषदक्षता की ओर इंगित करती है। वे द्वारकानगरी का निर्माण कराने के लिये विश्वकर्मा का आदेश देते हुए कहते हैं कि–
सूर्यकान्तादिभिश्चैव पुत्रैश्च स्फटिकाकृतैः ।
हरिद्वर्णैश्च मणिभिः श्यामैर्गौरमुखैश्चषैः ।।यहाँ स्पष्ट रूप से श्रीकृष्ण ने सूर्यकान्त स्फटिक की रची हुई तथा हरित वर्ण की मणियों से युक्त, उज्ज्वल, श्याम मणियों से यक्त पुत्तलिकाओं की रचना का आदेश विश्वकर्मा को दिया है। श्रीकृष्ण द्वारिकाधीश हैं। उन्हें ध्यान है कि नगर में बालकों को खेलने के लिये पुत्तलिका आवश्यक होगी।

