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वैजयिकी विद्या

विजय प्राप्त करने की कला

कामसूत्र के अनुसार वैजयिकी विद्या की व्याख्या इस प्रकार है–

विजयप्रयोजना वैजयिक्य: । दैव्यो मानुष्यश्च ॥

विजय प्राप्ति के लिए अधिगत विद्या 'वैजयिकी' एक कला है। यह दो प्रकार की होती हैं। एक दैवीय अर्थात् मन्त्र प्रयोग द्वारा विजय प्राप्त करना और दूसरी– 'मानुष' अर्थात् अपनी युद्ध कुशलता और बल से युद्ध में सफलता प्राप्त करना।

श्रीकृष्ण वैजयिकी विद्या के दोनों रूपों में पूर्णत: सक्षम थे, इसके अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं, यथा– श्रीकृष्ण जब रूक्मणि के निमंत्रण पर उनका हरण करके ले जाने लगे तो शिशुपाल और रूक्मी ने घोर विरोध किया। फिर भयंकर युद्ध हुआ, पर श्रीकृष्ण ने उस युद्ध में अपने युद्ध कौशल से उन्हें परास्त किया। यह आख्यान श्रीमद्भागवत के 54वें अध्याय में विस्तार से वर्णन किया गया है। इसी प्रकार भागवत पुराण के 59वें अध्याय में भौमासुर वध के प्रसंग में भी श्रीकृष्ण ने अपने युद्ध कौशल से मानुष वैजयिकी विद्या में अपनी निपुणता का परिचय दिया है।

दूसरे प्रकार की 'दैवीय' वैजयिकी विद्या का उदाहरण श्रीमद्भागवत के 63वें अध्याय में हमें मिलता है। वहाँ प्रसंग है बाणासुर से युद्ध का। वाणसुर के पक्ष में माहेश्वरज्वर जब श्रीकृष्ण की सेना पर आक्रमण करता है, तब श्रीकृष्ण उसके जबाब में वैष्णवज्वर भेज देते हैं। वैष्णवज्वर जब माहेश्वरज्वर को अविभूत कर देता है, तब वह श्रीकृष्ण की शरण में त्राहिमाम–त्राहिमाम कहने लगता है, श्रीकृष्ण उसे क्षमा कर देते हैं। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि श्रीकृष्ण वैजयिकी विद्या में अति निपुण थे और उनमें यह कला पूर्ण रूप से विकसित थी।