कामसूत्र के अनुसार छलितयोग कला की व्याख्या इस प्रकार है–
परव्यामोहनार्था: ।
यद्रूपमन्यरूपेण संप्रकाश्य हि वंचनम् ।
देवेतर प्रयोगाभ्यां ज्ञेयं तच्छलितं यथा ॥छलितयोग का अर्थ है– दूसरों को छलने का कौशल। कामशास्त्र के अनुसार बहुरूपिया बनना अथवा अन्य का रूप बनाकर किसी को छलना इस कला के अन्तर्गत आते हैं। श्रीकृष्ण इस छलने की कला में अत्यन्त निपुण थे। महर्षि वेदव्यास ने श्रीमद् भागवत पुराण में ऐसे अनेक उदाहरण दिए हैं, जिनमें श्रीकृष्ण ने इस कला का आश्रय लेकर अपनी लीलाएँ सम्पन्न की हैं। इस पुराण में ही दसवें स्कन्ध के तेरहवें अध्याय में जब ब्रह्मा ने बछड़ों और गोपों का मोहवश अपहरण कर लिया था, तब श्रीकृष्ण ने एक वर्ष तक स्वयं गोपों और बछड़ों का रूप धारण किया था–
दिवं ओक: येषां ते दिवौकसः । रेमे क्वचिन्नूपुरास गोष्ठ्याम् ।इसी प्रकार श्रीकृष्ण ने इन्द्र के मोहभंग वाले प्रसंग में स्वयं गोवर्धन का स्वरूप धारणकर ग्वाल बालों के द्वारा अर्पित की गई पकवान युक्त सामग्री को स्वयं ही ग्रहण किया था। यथा–
कृष्ण स्वन्यतमं रूपं गोपविश्रम्भणं गतः ।
शैलोऽमीति ब्रुवन् भूरि बलिमादद्बृहद्वपुः ।।35 ।।रासक्रीड़ा प्रसंग के समय महर्षि वेदव्यास ने श्रीकृष्ण की इस कला का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण के लिए 'योगेश्वर' शब्द का प्रयोग किया है। अर्थात् श्रीकृष्ण की योगमाया का यह प्रभाव है जिसके कारण अनेक रूप धारण करने की उनमें शक्ति है। इस प्रकार श्रीकृष्ण की छलितयोग कला का माहात्म्य भागवत पुराण में कई स्थानों पर उद्घाटित किया गया है।

