मध्यप्रदेश शासनश्रीकृष्ण पाथेय न्यासश्रीकृष्ण पाथेय न्याससंस्कृति विभाग, मध्यप्रदेश शासन
साइन इन
← 64 कलाएँ

गन्धायुक्ति

इत्र और सुगंधित पदार्थ बनाना

कामसूत्र के अनुसार गन्धायुक्ति कला की व्याख्या इस प्रकार है–

स्वशास्त्र विहित प्रपंचा प्रतीत प्रयोजनैव ।

गंधयुक्ति का अभिप्राय है– सुगन्ध–शास्त्र के अनुसार विभिन्न गंध बनाना। इस कला का यद्यपि प्रत्यक्ष रूप से सुंगधित पदार्थों के बनाने के संबंध में श्रीकृष्ण के जीवन में कोई प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं मिलता, किन्तु जप, यज्ञ आदि के कार्य हेतु चन्दन, हवन साम्रगी के सुगंधित पदार्थों का प्रयोग महाभारत और श्रीमद्भागवत में अवश्य मिलता है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इस कला का भी उन्हें ज्ञान था।