कामसूत्र के अनुसार क्रियाकल्प कला की व्याख्या इस प्रकार है–
त्रितयमपि काव्यक्रियांगं, परकाव्यावबोधार्थं च ।यह काव्य रचना एवं काव्य आस्वादन की शिक्षा देने वाली विद्या है। इस कला को आधुनिक भाषा में काव्यशास्त्र कहा जाता है, इसमें काव्य का प्रयोजन, शब्द शक्ति, गुण, अलंकार, रीति, वृत्ति, रस, ध्वनि, वक्रोक्ति आदि तत्त्वों का विवेचन होता है। काव्य शास्त्र या क्रियाकल्प की निपुणता व्यक्ति की अभिव्यक्ति से अभिव्यंजित होती है। श्रीमद्भागवत् में श्रीकृष्ण जब उद्धव जी को ज्ञान का उपदेश दे रहे होते हैं, तब उनकी भाषा ज्ञानगर्भित गंभीर होते हुए भी सौंदर्य, रस, अलंकार एवं गुणों से संपन्न होती है, यथा–
सुपर्णावेतौ सदृशौ सखायौ, यदृच्छयैतौ कृतनीडौ च वृक्षे ।
एकस्तयोः खादति पिप्पलान्नमन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान् ॥
आत्मानमन्यं च स वेद विद्वानपिप्पलादो न तु पिप्पलादः ।
योऽविद्या युक् स तु नित्यबद्धो विद्यामयो य: स तु नित्यमुक्तः ॥श्रीकृष्ण यहाँ ऋग्वेद के अंतर्गत दीर्घतमाऋषि के द्वारा गायी गई दो ऋचाओं के विचार की गंभीर व्याख्या करते हैं, इनमें काव्य के समस्त गुण निहित हैं, जहाँ वेद की ऋचा ( ऋग्वेद 1/164/20.) अति गंभीर आत्मतत्त्व की व्याख्या गूढ़ शब्दों में करती है, वहीं श्रीकृष्ण ने इसे अति ललित शब्दों में अलंकारों के साथ इन दो छंदों में व्यंजित कर दिया है।
विद्वान पाठक और कला समीक्षक यहाँ सहज अनुभूत कर सकते हैं कि किस प्रकार श्रीकृष्ण काव्य–शास्त्र कला में प्रवीण हैं। वे गंभीरतम आत्मतत्त्व को सौन्दर्य से अलंकृत कर अपने उपदेश को सुखद ग्राह्य बनाने में परम निपुण हैं।

