कामसूत्र के अनुसार मेष कुक्कुट लावक युद्ध विधि कला की व्याख्या इस प्रकार है–
सजीवद्यूतविधान मेतत् ।
तत्रोपस्थाना दिभिश्च तुरंगैर्युद्ध विधानं क्रीड़ार्थं वादार्थम् ॥मेष, मुर्गा, तोता, लवा आदि पशु–पक्षियों को खेल जनित उत्तेजना और मनोरंजन के लिए लड़ाना एक कला मानी गई है।
श्रीकृष्ण वृन्दावन में बछड़ों को चराने जाते हैं और बछड़े इधर–उधर घास को चरने में लग जाते हैं, तब श्रीकृष्ण इस अवकाश के समय में क्या करते हैं, इसका चित्र शुकदेव जी महाराज इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं–
कभी श्रीकृष्ण मदान्ध भौंरों के गान का उनके साथ अनुकरण करते हैं और कभी वे हंसों के साथ उनकी गुँज की नकल करके कू–के लगाते हैं। कभी वे नाचते हुए मोरों के नृत्य का अनुकरण करते हुए कै–कों कैं–कों वे स्वर में स्वर मिलाते हुए स्वयं भी नाचते हैं। कभी वे सारस, चकवा–चकवीं, चकोर और भारद्वाज पक्षियों का अनुकरण करके इन्हें चिढ़ाते हैं। कभी वे पत्तों के बीच में छिपी हुई कोकिल का अनुकरण करते हैं। इस प्रकार वे उस वन में ग्वाल–बालों के साथ आनन्द कर रहे हैं। – ( श्रीमद्भाग.पु.10/15/9–16 )
अत: स्पष्ट है कि मेष आदि पशु–पक्षियों का अनुकरण करने में वे सिद्धहस्त हैं, इसीलिए वे पशु–पक्षियों के खेलजनित उत्तेजना देने में समर्थ हैं और साथ ही वे उन्हें लड़ाने में भी निश्चित सफलता प्राप्त करने वाले कलाविद् हैं।

