'म्लेच्छित विकल्प' का अर्थ है– गुप्त भाषा का ज्ञान। जब किसी भाषा के पद सर्वमान्य अर्थ को व्यक्त ना करके अन्य अर्थ को अभिव्यक्त करें तो वह गुप्त या कूट भाषा अथवा म्लेच्छित भाषा कहलाती है। प्राचीन भारत में राजकुमारों एवं प्रशासनिक अधिकारियों को गुरु इसका ज्ञान देते थे। श्रीमद् भागवत में दशम स्कन्ध के अंतर्गत एक प्रसंग 'श्यमन्तक उपाख्यान !' आता है–
यत्साधुशब्दोपनिबद्धमप्यक्षर, विन्यासादस्पष्टार्थ तस्य विकल्पाः ।श्रीकृष्ण को यह कलंक लगता है कि उन्होंने प्रसेन को मारकर मणि हरण कर ली है, इस अपवाद को दूर करने के लिए वे निकलते हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि प्रसेन को शिकार के समय किसी सिंह ने मार डाला था और मणि सिंह ने ले ली थी। उन्होंने यह भी पता लगाया कि सिंह को किसी भयंकर ऋक्ष ( रीछ) ने मार डाला और रीछ उस मणि को गुफा में लेकर चला गया है। श्रीकृष्ण रीछ के पैरों के निशान देखते हुए गुफा के भीतर गये। वहाँ एक युवा लड़की मणि से खेल रही है। मणि के प्रकाश से गुफा जगमगा रही है। श्रीकृष्ण ने मणि लेने का प्रयत्न किया तो वह लड़की चिल्लाई, जिसे सुनकर एक बड़ा रीछ आया और श्रीकृष्ण से लड़ने लगा। अठाईस दिनों तक यह लड़ाई श्रीकृष्ण और ऋक्ष राज के बीच चलती रही, तब श्रीकृष्ण ने उस युद्ध में पूरा जोर लगा दिया और ऋक्षराज को दबा दिया, तब वे ऋक्षराज श्रीकृष्ण से कहने लगे–
जानेत्वां सर्वभूतानां प्राण ओजः सहो बलम् ।
विष्णुं पुराणपुरुषं प्रभविष्णुमधीश्वरम् ।
त्वंहि विश्वसृजां स्रष्टा सृज्यानामपि यच्चसत् ।
कालः कल यतामीशः पर आत्मा तथाऽऽत्मनाम् ॥27 ॥अर्थात ऋक्षराज ने कहा– मैं आपको जान गया कि आप पुराण पुरुष श्रीविष्णु हैं। आप ही सृष्टि के कर्ताधर्ता हैं। इस प्रकार ऋक्षराज ने जाना, फिर श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया और बताया कि मिथ्या अभियोग लगाया गया था, उसके कलंक का मार्जन करने के लिए मुझे यह मणि चाहिये। ऋक्षराज ने विनम्रतापूर्वक अपनी कन्या जाम्बवती को और उसके साथ ही दायाद ( दहेज) के रूप में स्यमन्तक मणि प्रदान की। – ( श्रीमद्भागव 10/56/26–32)
यहाँ श्रीकृष्ण मानुष रूप में थे और ऋक्षराज उस समय वनवासी ऋक्ष अर्थात् रीछ नाम वाली जाति के थे। इससे यह बात स्पष्ट रूप से व्यक्त होती है कि श्रीकृष्ण को म्लेच्छित भाषा का ज्ञान था, तभी तो वे संवाद कर सके।

