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नाटकाख्यायिका दर्शन

नाटक और कहानियों की रचना

कामसूत्र के अनुसार नाटकाख्यायिका दर्शन कला की व्याख्या इस प्रकार है–

काव्येषु गद्यपद्येषु नाटकस्य आख्यायिकायाश्च प्रधानगद्यत्वाद्दर्शनं परिज्ञानमिति ॥

अर्थात् काव्य, नाटक, आख्यायिका आदि विद्याओं का ज्ञान। यह नाट्य एवं कथा काव्यों का रसास्वादन सहृदय के रूप में करने और समझने की कला है। इसका प्रथम प्रमुख सोपान गद्यात्मक नाटक है और दूसरा सोपान है– आख्यायिका अर्थात् ऐतिहासिक कथा अथवा उपाख्यान स्वरूप का परिज्ञान। इस प्रकार नाटक और आख्यायिका इन दोनों को समझने की यह श्रेष्ठ कला है।

श्रीकृष्ण अपने बालपन से ही तथा बाद को अपने गुरु द्वारा प्रशिक्षण से नाट्य कला में अत्यंत प्रवीण हो गये थे। फलस्वरूप नटवर, नट और नटेश जैसी इन उपाधियों से उन्हें भगवान वेदव्यास जी ने महाभारत एवं अन्य पुराणों में स्मरण किया है और श्रीकृष्ण को कला का 'आदिगुरु' कहा है।

श्रीमद्भागवत पुराण के एकादश स्कंध में उद्धव जी द्वारा पूछे गये प्रश्नोत्तर से संबधित ( अध्याय सात, आठ और नौ) में श्रीकृष्ण ने उद्धव को अवधूत आख्यान सुनाया है जो अत्यंत शिक्षाप्रद ज्ञान से परिपूर्ण और अद्भुत है। इन सब उदाहरणों से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण 'नाटकाख्यायिका दर्शन कला' में पूर्ण निपुण थे।