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पुष्पशकटिका

कामसूत्र के अनुसार पुष्पशकटिका कला की व्याख्या इस प्रकार है–

पुष्पाणि निमित्तकृत्य प्रणीता ।

फूलों को गूँथ कर या यष्टियों में लगाकर शकट छकड़ा, रथ आदि वाहनों को यथा आकार सजाना इस कला के अन्तर्गत आता है। पुष्पाभूषण एवं माल्यादि बनाने के साथ ही फूलों के विन्यास से आकृतियाँ बनाना सौन्दर्योपासना है।

माल्यग्रथन ही मूलत: इस कला का आधार है, क्योंकि पुष्पों के ग्रथन से पुष्प सृष्टि का निर्माण किया जाता है और इन्हीं पुष्पयष्टियों से पुष्प शकटिका का निर्माण किया जाता है। अत: जो माल्य ग्रथन कला में निपुण है, निश्चिय ही वह पुष्पशकटिका के निर्माण कौशल में अत्यन्त प्रवीण होगा। तात्पर्य कि श्रीकृष्ण परोक्षरूप में पुष्पशकटिका कला में अत्यन्त निपुण थे, यह सिद्ध होता है।