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तक्षण

बढ़ईगिरी / लकड़ी का काम

  • तक्षण कला

लकड़ी को काट–छील कर आसन, पर्यंक, रथ आदि बनाने की कला तक्षण है। इसको वर्धकी कर्म, दारुकर्म या काष्ठ विधि भी कहते हैं और शिल्पी को 'तक्षा' कहा जाता है। यह कला तक्षकर्म की तरह भवन निर्माण कला का ही अंग है। राजभवन में उल्लिखित गवाक्ष, द्वार, सिंहासन, आसन, पीठिका, पादपीठ, मण्डप, पर्यंक आदि तक्षण कला के उदाहरण हैं।

वर्धकिकर्म शयनासनाद्यर्थम् । तक्षण का अर्थ है काष्ठ शिल्प ॥

श्रीकृष्ण ने जब समुद्र में द्वारिकापुरी का निर्माण किया था, तब विश्वकर्मा जी को उस नगरी में इन सब उपस्करों के निर्माण की भी आज्ञा दी थी। जो द्वारिकापुरी बनाई गयी थी उसमें विश्वकर्मा ने तक्षकर्म और तक्षण दोनों कलाओं के नियमों का पालन किया था।

श्रीकृष्ण ने कहा– मेरी सोलह सहस्र एक सौ आठ पत्नियों के लिए सुन्दर महलों का निर्माण करें, जो खाईयों से युक्त तथा ऊँची–ऊँची चहार दीवारियों से घिरे हों, जिनमें प्रत्येक बारह कमरों से युक्त एवं सिंहद्वार से परिष्कृत हो। जो चित्र–विचित्र कृत्रिम किवाड़ों से युक्त हो, निषिद्ध वृक्षों से रहित और प्रसिद्ध वृक्षों से सम्पन्न हो और जिनके आँगन शुभलक्षण युक्त एवं चन्द्रवेधी हो। इसी प्रकार यदुवंशियों एवं उनके सेवकों के लिए भी दिव्य आश्रम बनाये जायें। राजा उग्रसेन का भवन सर्व प्रसिद्ध तथा मेरे पिता वसुदेव का आश्रय सर्वतोभद्र होना चाहिये। ( ब्रह्मा. वै. पु., कृष्ण जन्म खण्ड, 30103/23–26 )

इससे सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण इन दोनों तक्ष और तक्षण कलाओं में भी पूर्णत: निपुण थे, अन्यथा वे विश्वकर्मा जी को इस प्रकार का आदेश देने में सक्षम न होते।