कामसूत्र के अनुसार वास्तुविद्या कला की व्याख्या इस प्रकार से है–
गृहकर्मोपयोगिनी ।वास्तु विद्या प्राचीन ग्रंथों के अनुसार शिल्प शास्त्र का एक अंग है। शिल्प शास्त्र के विषय में महर्षि भृगु ने इस प्रकार से परिभाषा दी है–
नाना विधानां वस्तुनां यन्त्रणां कल्प सम्पदाम् ।
धातुनां साधनानां च वास्तुनां शिल्प संज्ञितम् ॥अर्थात् मंदिर, प्रासाद, गृह निर्माण के लिए विविध वस्तुओं जैसे– यंत्र, युक्ति, प्रयुक्ति, धातु साधन, क्रत्रिम वस्तु आदि का उपयोग शिल्प शास्त्र कहलाता है। इस प्रकार शिल्प शास्त्र के तीन खण्ड होते हैं– धातुखण्ड, साधनखण्ड एवं वास्तुखण्ड। इसके तीसरे भाग 'वास्तु खण्ड' में नगर रचना विद्या का क्षेत्र आता है। यह विद्या बहुत प्राचीन है। मत्स्य पुराण के अनुसार वास्तु शास्त्र के अठारह प्रसिद्ध आचार्य हुए हैं–
भृंगु अत्रि, वशिष्ट, विश्वकर्मा, यम, नारद, नग्नाजित, विशालाक्ष, पुरन्दर, ब्रह्मा, कुमार, नन्दीश्वर, शौनक, गर्ग, वासुदेव, अनिरुद्ध, शुक्र, बृहस्पति। –( मत्स्य पुराण–252/2–4 )
जब मनुष्य निवास के लिए ईंट, पत्थर, लकड़ी आदि से गृह, प्रासाद, मंदिर आदि का निर्माण करता है, तब वास्तु शास्त्र के नियम लागू हो जाते हैं। श्रीकृष्ण इस विद्या में अत्यन्त निपुण थे। जब उन्होंने समुद्र के अन्दर द्वारका नगरी बसायी तो वास्तु शास्त्र के अनुसार ही उसका
निर्माण कराया गया–
इति सम्मन्त्र्य भगवान् दुर्गंद्वादश योजनम् ।
अन्तः समुद्रे नगरं कृत्स्नाद्भुतमचीकरत् ॥
दृश्यते यत्रहि त्वाष्ट्रं विज्ञानं शिल्पनै पुणम् ।
रथ्याचत्वर वीथीभिर्यथा वास्तु विनिर्मितम् ॥
सुरद्रुमलतोद्यान विचित्रो पवना न्वितम् ।
हेमश्रृङ्गैर्दिदिविस्पृगिभः स्फाटिकाट्टालगोपुरैः ॥
राजतारकुटैः कोष्ठै हेंमकुम्भैरलङ्कृतैः ।
रत्नकूटैगृहै हैंमैर्महामरकत स्थलैः ॥
वास्तोष्पतीनां च गृहैर्वलभी भिश्च निर्मितम् ।
चातुर्वर्ण्यजनाकीर्णं यदुदेवगृहोल्लसत् ॥इसी प्रकार ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णन आता है, जिस अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने विश्वकर्मा जी को वास्तु के नियमों के अनुसार द्वारका नगरी समुद्र के अन्त: क्षेत्र में निर्माण करने की आज्ञा दी थी।
शत योजन पर्यन्तं नगरं सुमनोहरम ......
यथा विधानं यद्योगं यत्र यन्मुक्तमीप्सितम् ।श्रीकृष्ण भगवान बोले– हे विश्वकर्मा ! तुम सौ योजन के विस्तार वाला एक अति मनोहर नगर बनाओ, जो पद्मराग, अत्युत्तम, इन्द्रनील, मनोहर पारिभद्र, पलङ्क, स्यमन्तक, गन्धाक, गालिम, चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त, स्फटिक की रची हुई पुत्तलियों, फली, श्याम–श्वेत और नीली मणियों, अनार के दानों सदृश फली गोरोचना, कमलबीज के उज्ज्वल, परिष्कृत, श्वेत चम्पा के समान कांति युक्त, तपाये हुए स्वर्ण की सी चमकीली, स्वर्ण के मूल्य से सौ गुनी अधिक मूल्यवाली थोड़ी–थोड़ी लाल, परम सुन्दर, वजनदार, सर्वोत्तम और पूजनीय उत्तम मणियों द्वारा वास्तुशास्त्र के विधानानुसार यथायोग्य ( घटा–बढ़ाकर) बनाया जाये।
इस प्रकार इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि श्रीकृष्ण वास्तु कला में निष्णात थे।

