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वृक्षायुर्वेद योग

पेड़-पौधों की चिकित्सा

कामसूत्र के अनुसार वृक्षायुर्वेद योग कला की व्याख्या इस प्रकार है–

रोपण–पुष्टि–चिकित्सा वैचिच्यकृतो रहोद्यानार्थः ।

गृह उद्यान के लिए कौन–से वृक्ष लगाना चाहिए, किनका पालन–पोषण करना चाहिए एवं चिकित्सा शास्त्र में उनका क्या महत्त्व है, यह विषय वृक्षायुर्वेद के अन्तर्गत आता है।

श्रीमद्भागवत तथा ब्रह्मवैवर्त्त पुराण में वर्णन आता है कि श्रीकृष्ण ने समुद्र में द्वारका नगरी का निर्माण कराया। द्वारिका नगरी के निर्माण के लिए यह भी आवश्यक था कि उस सुन्दर, सुरम्य नगरी के निकट एक वृक्षों से परिपूर्ण तथा सुव्यस्थित वाटिका का निर्माण हो। विश्वकर्मा जी को इस वाटिका निर्माण के लिए श्रीकृष्ण ने जो बताया, वह श्रीकृष्ण के वृक्षायुर्वेद योग की कला में उनकी निष्णार्तता का एक उदाहरण है। यह वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्मखण्ड उत्तरार्द्ध के अन्तर्गत 103वें अध्याय ( श्लोक क्रमांक 34 से 50 तक) में आता है– नारियल के वृक्ष लगाने से घर के मालिक को धन की प्राप्ति होती है। यदि इसे घर के ईशान अथवा पूर्व दिशा में लगाया जाये तो यह पुत्रप्रद होता है। आम वृक्ष कहीं भी लगाया जा सकता है, यह हमेशा शुभ है। बेल, कटहल, नीबू और वदरी वृक्ष पूर्व दिशा में शुभ और संतान प्रद होते हैं। जामुन, केला और आँवला घर के पूर्व में और दक्षिण में शुभ होते हैं। सुपाड़ी का वृक्ष दक्षिण में धनप्रद एवं पश्चिम व ईशान कोण में शुभ माना जाता है। शिविर में वटवृक्ष नहीं लगाना चाहिए, इससे चोर का भय रहता है, पर नगर के मध्य में वटवृक्ष शुभ होता है। इसका दर्शन ही शुभप्रद है। नगर और गाँव के भीतर सेमर का वृक्ष लगाना सर्वथा निषिद्ध है। इमली वृक्ष गाँव में लगाना निषिद्ध नहीं है, पर शिविर में इसे नहीं लगाना चाहिए। साथ ही आश्रम में भी इमली का वृक्ष निषिद्ध है, पर गाँव और कस्बों में इसे लगाना निषिद्ध नहीं है। कचनार और खजूर शिविर में नहीं लगाना चाहिए। गाँव और नगरों के बीच की खाली जगह में चने आदि अन्नों के पौधे मंगलप्रद माने जाते हैं। इसी प्रकार ईख के पौधे शुभ होते हैं। अशोक, शिरिष और कदम्ब यह सदैव शुभ होते हैं। श्रीकृष्ण ने यह बात वृक्षों के विषय में विश्वकर्मा को बताई है, जो इस बात का प्रमाण है कि उन्हें वृक्षायुर्वेद योग का ज्ञान था तथा वे उसके मर्मज्ञ थे।