वात्सायन के अनुसार दशनवसनांग राग कला की व्याख्या इस प्रकार है –
अंग रागोऽड्गमाष्टि: कुंकुमादिना रंजन विधिरिति ।
विलासिनीनां दशनादि संस्कार स्मत्यन्ता भीष्टत्वात् ॥दशनवसनांग राग का अर्थ है– दाँत, वस्त्र और शरीर के अंगों को रंगने की कला; शरीर पर गोरोचन, तीर्थ मृत्तिका या अंगराग का लेपन; पैरों को रंगने के लिए लाक्षारस आदि का उपयोग; ओंठों को अलंकृत किए जाने के लिए किसी रस या रंग का प्रयोग; वस्त्रों को कुमकुम आदि के रंगों से रंगना; ताम्बूल के चर्वण से अघरों को रंजित करना; वक्ष स्थल पर सुगंधित चन्दन का लेप करना; माथे पर चन्दन लगाना; मुनियों का अपने शरीर को भस्म से लेपित करना आदि इस कला के अन्तर्गत इंगित होते हैं।
पादांगुलि नखाग्रेच सुन्दरा लक्तकं ददौ ।.....श्रीकृष्ण ने राधा के पैरों और अंगुलियों के नखों में सुन्दर महावर सजाया।
ब्रह्मवैवर्त्तपुराण के पूर्वार्द्ध में अट्ठाईसवें अध्याय के अन्तर्गत रास क्रीड़ा वर्णन के प्रसंग में भी श्री व्यास जी ने श्रीकृष्ण के द्वारा राजेश्वरी के श्रँगार का सुन्दर चित्र खीचा है, जो इस प्रकार है–
निर्माय चूडां ललितां कामिनीं चित्तमोहिनीम् । शोभनैर्मालतीर्माल्यैश्चकार वेष्टनं पुनः ॥
श्रीकृष्णो राधिकायाश्च कबरीं सुमनोहराम् । कृत्वा कुण्डल संस्कारं निर्ममे पत्रकावलीम् ॥
ददौ ललाटे सिन्दूरं कस्तूरी बिन्दुभि: सह । तदधश्चन्दनेन्दुं च सुसूक्ष्मं सुमनोहरम् ॥
नखाङ्क स्तनयो रुर्वोरस्येव घनं मुदा । दत्त्वा तां वासयामास वह्निशुद्धां शुकेन वै ॥
चन्दनागुरु कस्तूरी कुङ् कुमानां द्रवेण सः । कृत्वा वक्षसिसंलिप्य चुचुम्ब च मुहुर्मुहुः ॥
पुनराश्लेषणं कृत्वा ददौ मालां गले पुनः । भूषणैर्भूषितां कृत्वामञ्जीरं चरणे ददौ ॥
अलक्तं चरणयोर्नखेषु च ददौ पुनः । एवं गोपश्च गोपीनां विदधौ च पृथक्पृथक् ॥तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्ण ने राजेश्वरी की चोटी को बनाया और उसमें मालती के फूलों की माला गूँथ दी। फिर उन्होंने श्रीराधा के कपोलों पर पत्रावली चित्रित की। तदनन्तर ललाट में कस्तुरी से युक्त सिन्दूर की बिन्दी लगाई और अत्यन्त मनोहर चन्दन चर्चित किया। चन्दन, अगरु कस्तुरी और कुमकुम के द्रव्य से उनके वक्षस्थल पर लेप किया। उनके चरणों के नखों में लाक्षारस लगाया और नूपुरों से विभूषित किया, इस प्रकार श्रीराधा का सर्वांग श्रँगार श्रीमाधव ने किया।

