कामसूत्र के अनुसार पुष्पास्तरण कला की व्याख्या इस प्रकार है–
नाना वर्णै: पुष्पै: सूचीनानादिबद्धैरम्यस्यते ।
त देव वास गृहोपस्थान मण्डपादिषु यस्य, पुष्पशयन मित्य परा संज्ञा ॥पुष्पास्तरण का अर्थ है– फूलों की सेज बिछाने की कला। रंग–बिरंगे फूलों को सूई आदि से क्रमबद्ध करके बिछाना, जो निवास घर, पूजा स्थान अथवा मण्डप आदि में बनाया जाता है।
इस कला के भीतर नाना वर्णों के पुष्पों को गूँथकर, वासगृह, उपवन, वेदिका, राजमार्ग, उपस्थान, मण्डप आदि की पुष्प सज्जा भी शामिल है। 'पुष्प शयन' की रचना करना भी इसी कला का एक अंग माना जाता रहा है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णन आता है कि श्रीकृष्ण ने क्रीड़ा करते हुए राजेश्वरी राधा के लिए एकान्त में पुष्प–चन्दन शैय्या का निर्माण किया, जिस पर भगवती राजेश्वरी श्रीराधिका विराजमान हुईं–
राधा सा स्वामिता सार्धं पुष्प चन्दन चर्चिता ।
पुष्पचन्दन तल्पे च तस्थौ रहसि नारद ॥इस उदाहरण से स्पष्ट हो रहा है कि श्रीकृष्ण पुष्पास्तरण कला एवं पुष्पशयन कला दोनों में निपुण थे।

