धातुवाद का तात्पर्य है धातुविज्ञान या खनिज विज्ञान। स्वर्ण, रूक्म ( चाँदी), अयस ( काँसा), श्यामायश् ( लोहा), लोहायस् ताँबा, वज्र, मणि, मुक्ता ( मोती), लवण, प्रस्तर ( पत्थर), पारद, गेरु आदि खनिजों को खान से प्राप्त करना, शुद्ध करना, मिश्रण करना और विविध प्रकार के उपयोगी पदार्थ बनाना धातुवाद है।
मृत्प्रस्तररत्नधातूनां, पातनशोधनमेलनादिज्ञानम् ।वास्तु कला में आभूषण बनाने का जो आदेश विश्वकर्मा जी को दिया था उस आदेश से उनका इस कला में पारंगत होना, मणिमय भूमि की रचना करने में तथा तक्ष कर्म कला में धातुवाद कला का उपयोग होता है। धनुष–वाण निर्माण में भी धातु कला का प्रयोग होता है श्रीकृष्ण धातुवाद कला में पूर्ण निपुण थे। उन्होंने द्वारिकापुरी निर्माण जब करायी तब विश्वकर्मा जी को श्रीकृष्ण द्वारा इन कलाओं में दक्ष होने का स्वरूप झलकता है।
श्रीकृष्ण ने विश्वकर्मा से कहा कि– 'तुम मनोहर नगर का निर्माण करो। वह निर्माण जो पद्मराग, मरकत, इंद्रनील, पारिभद्र, अलंख, स्यमन्तक, गंधाक, गालिम, चंद्रकान्त, सूर्यकान्त, स्फटिक की रची हुई पुत्तलियों, फली, श्याम–श्वेत और नीली मणियों, अनार के दाने के सदृश फली गोरोचना, कमल बीज के सदृश, नीले कमल सदृश मणि वाली, कज्जल के से आकार वाली, उज्ज्वल, परिष्कृत, श्वेत चम्पा के समान कांति वाली, तपाये हुए सोने कैसी चमकीली सोने के मूल्य से सौ गुनी अधिक मूल्य वाली, थोड़ी–थोड़ी लाल परम् सुंदर, वजनदार, सर्वोत्तम और पूजनीय मणियों के द्वारा वास्तुशास्त्र के अनुसार होना चाहिए। – ( ब्रह्मवैवर्त.पु.कृष्ण जन्म खं. उफ अ.103/14–20 )
यहाँ स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण को इन मणियों का न केवल ज्ञान है अपितु उनका उपयोग, उनका रंग संयोजन, उनका मूल्य इसका पूरा–पूरा विज्ञान भी उन्हें भली–भाँति ज्ञात है। श्रीकृष्ण को धातुवाद कला का ज्ञान अत्यंत गहरा था, यह इस उदाहरण से सिद्ध है।

