कामसूत्र के अनुसार उत्सादन–संवाहन–केशमर्दन कुशलता कला की व्याख्या इस प्रकार है–
पादाभ्यां यन्मर्दनं तदुत्सादनम् ।
हस्ताभ्यां याञ्छिरोऽभ्यंगकर्म तत्केशमर्दनम् ।
अंगेषु मर्दनं संवाहनम् ॥इस कला के अंतर्गत हाथ–पैरों की मालिश, हाथों से शरीर और बालों की मालिश आदि आते हैं। भगवान वेदव्यास ने ब्रह्मवैवर्त पुराण में राधा और श्रीकृष्ण की क्रीड़ा प्रसंग में लिखा है–
लुप्तचन्दनसिंदूरां कबरीशिथिलां सतीम् ।
प्राणाधिकां प्रियतमांधारयामास वाससी ।
वह्निशुद्धेऽतिसूक्ष्मे चामूल्ये विश्वसुदुर्लभे ।
कबरीं रचयामास ददौ कुङ्कुमचन्दनम् ।
तद्दात्रे च गले हारममूल्यं रत्ननिर्मितम् ।यही नहीं, पूवार्द्ध कृष्ण जन्मखण्ड के 56 वें अध्याय में व्यास जी स्पष्ट रूप से लिखते हैं कि– श्रीकृष्ण रासलीला के पूर्व प्रेमपूर्वक अति शुद्ध सूक्ष्म वस्त्र द्वारा श्रीराधा के मुख को मार्जन करके पोंछते हैं, फिर केशों का संमार्जन करते हैं, इसके उपरांत उनकी चोटी को कंघी से झाड़कर माधवी और मालती पुष्पों की मालाओं से सुशोभित कर सुंदर जूड़ा बनाते हैं, फिर जूड़े को रत्नों के सूत्रों से आबद्ध करते हैं।
अत: स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण उत्सादन–संवाहन–केशमर्दन कुशलता की कला में भी अति निपुण थे।

