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विचित्रशाकयूषभक्ष्य विकार क्रिया

स्वादिष्ट व्यंजन बनाना

कामसूत्र के अनुसार–

विचित्रशाकयूषभक्ष्यविकारक्रिया ।

तात्पर्य यह है कि इसमें विभिन्न प्रकार के शाक, कढ़ी, रस मिठाई इत्यादि अथवा भक्ष्य, भोज्य, लेहय, चोष्य एवं पेय प्रकार के स्वादिष्ट भोजन तैयार किए जाने की कला का संकेत है। सामवेद की भृगुवल्ली के अन्तर्गत जो सामगान किया जाता है, उसमें बार–बार यही दुहराया जाता है कि मैं अन्न हूँ और मैं ही अन्न का खाने वाला हूँ। परमेश्वर ही स्वयं अन्न रूप है और वही अग्नि बनकर इस अपने स्वरूप अन्न को भक्षण कर लेते हैं। यही क्रिया सृष्टि में चल रही है। यही प्रभु का स्वभाव है। इसी कला का लघु संस्करण यह विचित्रशाकयूषभक्ष्य विकार क्रिया नाम की कला है।

श्रीकृष्ण स्वयं ब्रह्म है और प्रत्येक मानव भी अवरित ( परिच्छिन्न) रूप में ब्रह्म रूप ही है। श्रीकृष्ण ने इसी का प्रदर्शन श्रीमद्भागवत में दो बार किया है। एक बार यज्ञ करते हुए ब्राह्मणों की पत्नियों से अन्न की याचना और उसका उपभोग करने के रूप में, दूसरी बार गोवर्धन पर्वत के पूजन कराने के अवसर पर स्वयं गोवर्धन का रूप धारण करने और उस अन्न को ग्रहण करने के समय।

अहं अन्नम्, अहं अन्नम्, अहं अन्नम्, अहं अन्नादो, अहं अन्नादो:, अहं अन्नादो । ..... ॥
–( भृगुवल्ली )

श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध के तेईसवें अध्याय में व्यास जी ने कहा है कि– 'एक बार श्रीकृष्ण गोपों के साथ गौचारण के लिए वन में गये हुए थे, जहाँ श्रीकृष्ण और ग्वाल–बाल गौचारण कर रहे थे। वहीं पास में वेद के ज्ञाता ब्राह्मण स्वर्ग की इच्छा से अंगरस नाम का यज्ञ कर रहे थे। श्रीकृष्ण ने ब्राह्मणों के पास गोपों को यह कहकर भेजा कि ब्राह्मणों से नम्रता पूर्वक कहना कि बलराम और कृष्ण ने हाथ जोड़कर आपसे विनय की है कि आप हमें यह थोड़ा–सा ओदन प्रदान करें।

इस प्रकार श्रीकृष्ण की आज्ञा से गोप गये और ब्राह्मणों से अन्न की याचना की। ब्राह्मणों ने गोपों की बात अनसुनी कर दी। गोप लौट आये और कृष्ण को बताया कि अन्न नहीं मिला। श्रीकृष्ण हँसे और कहा कि तुम फिर से जाओ और अबकी बार ब्राह्मणों से नहीं, उनकी पत्नियों को प्रणाम करके हमारे लिए अन्न की याचना करना। गोप फिर से गये और ब्राह्मण पत्नियों से गोपों ने कहा कि– श्रीकृष्ण और बलराम ने अपने साथियों के सहित आपसे भोजन की याचना की है। ब्राह्मण पत्नियाँ तुरन्त भक्ष्य, भोज्य, चोष्य और लैह्य स्वादिष्ट अन्न सुन्दर पात्रों में लेकर कृष्ण के सम्मुख उपस्थित होने के लिए चल पड़ीं। उन्होंने वह अन्न प्रेम से गोप–ग्वालों सहित श्रीकृष्ण और बलराम को प्रस्तुत किया, जिसे श्रीकृष्ण ने प्रेम पूर्वक ग्रहण किया। वेदव्यास जी कहते हैं–

भगवानपि गोविन्दस्तेनैवान्नेन गोपकान् । चतुर्विंधेनाशयित्वा स्वयं च बुभुजे प्रभु: ॥
–श्रीमद्भाग ( 10/23/35 )

अर्थात् भगवान ने भी उस चतुर्विध अन्न को प्रथम ग्वाल–बालों को खिलाया, फिर स्वयं प्रसन्न मन से उस पवित्र अन्न को ग्रहण किया। यहाँ चतुर्विंधेन शब्द में यह भी संकेत है कि श्रीकृष्ण चतुर्विध अन्न को अति प्रेम करते हैं। इसी प्रकार श्रीमद्भागवत में ही गोवर्धन पर्वत के यज्ञ की कथा के प्रसंग में कहा गया है भगवान को प्रेम से अर्पित विविध प्रकार के पकवान ( चतुर्विध अन्न) अत्यन्त प्रिय हैं, जो यह इंगित करता है कि श्रीकृष्ण विचित्रशाकयूषभक्ष्य विकार क्रिया नामक कला में निपुण हैं। इस घटना का वर्णन व्यास जी ने इस प्रकार किया है। बृज में पहले इन्द्र के लिए यज्ञ सम्पन्न किया जाता था। श्रीकृष्ण ने इस यज्ञ के स्थान पर गोवर्धन पूजा की प्रथा का विधान प्रचलित किया। ग्वालों और उनकी पत्नियों ने जब गोवर्धन की विविध प्रकार के पकवान इसमें तीनों प्रकार के पाक, हलुआ, लपसी, मालपुआ, पूड़ी, कचौड़ी, संयाव, दूध–दही से युक्त भोजन, पर्वतराज गोवर्धन को प्रेमपूर्वक अर्पित किया तो श्रीकृष्ण ने स्वयं पर्वत का रूप धारणकर वह अन्न ग्रहण किया था।

कृष्णस्त्वन्य तमं रूपं गोविश्रम्भणं गत: । शैलोऽस्मीति ब्रुवन् भूरि बलिमादद् बृहद्वपु: ॥
–( श्रीमद्भागवत10/24–25–35 )

इन दोनों ही उदाहरणों से ये स्पष्ट रूप से संसूचित होता है कि श्रीकृष्ण इस कला के पूर्ण रूप से अनुभवी ज्ञाता थे।