कामसूत्र के टीकाकार यशोधर ने सुई से जोड़ने या सीलने के काम को सूचीवान कर्म कहा है। पात्रों द्वारा वस्त्र धारण किया जाना ही सूचीवान कला का सूचक है, क्योंकि सुई–धागों से बिना सिले कपड़े धारण नहीं किये जा सकते। शुक्रनीति में कहा है कि–
सूच्या सन्धानकरणम् । सीवनं, ऊतनं, विरचनम् ॥अनेकतन्तुसंयोगै: पटबन्ध: कला स्मृता ।संकेत यह है कि कई प्रकार के वस्त्रों को धारण करना और चुनना इस कला के अंतर्गत आता है। श्रीमद्भागवत् में श्रीकृष्ण के जीवन में एक अवसर आता है, जब इस कला के प्रति उनकी रुचि स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होती है। भागवत दशवें स्कन्ध में 41वें अध्याय के अंतर्गत वर्णन आता है कि श्रीकृष्ण अपने मामा कंस के यज्ञ में बड़े भाई बलराम और सहचर ग्वाल–बालों के सहित निकले हैं, उन्हें मार्ग में एक रजक ( धोबी) मिला, जो उत्तम प्रकार के वस्त्रों को लेकर राजा के पास जा रहा था, तब श्रीकृष्ण ने उस रजक से कहा कि हमें ये उचित वस्त्र कृपापूर्वक दो। रजक यह सुनकर क्रोधपूर्वक बोला– 'ये वस्त्र तुम जैसे गाँव–खेड़े और जंगल के रहने वालों के लिये नहीं है, ये तो राजा के लिये है, ये राजकुल के लिये है, तुम जैसे चोरों के लिए नहीं है।' यह सुनना था कि कृष्ण ने तत्काल उसकी गर्दन पर जोर से हाथ मारा, परिणामस्वरूप उसकी गर्दन टूटकर गिर, गई फिर उन वस्त्रों को श्रीकृष्ण ने गृहण किया–
वसित्वाऽऽत्मप्रिये वस्त्रे कृष्ण: सङ्कर्षणस्तथा ।
शेषाण्यादत्त गोपेभ्यो विसृज्य भुवि कानिचित् ।।श्रीकृष्ण और बलराम ने जो उन्हें अतिप्रिय थे, उन वस्त्रों को स्वयं धारण कर लिया और बचे हुये वस्त्र को उन गोप–ग्वालों में बाँट दिया। यदि हम गहराई से व्यासजी के कहे हुये इस कथन को समझें तो हम स्पष्ट रूप से इस तथ्य पर पहुँचते हैं कि श्रीकृष्ण इस कला में समर्थ थे। वस्त्र राजकुल के थे, विभिन्न प्रकार के होंगे, उन वस्त्रों की इतनी बड़ी राशि में से कौन–से वस्त्र श्रेष्ठ हैं, उपादेय हैं, वही वस्त्र श्रीकृष्ण को प्रिय हो सकते थे और उन्हीं वस्त्रों को श्रीकृष्ण ने चुना होगा। यह सिद्ध करता है कि वे इस सूचीवान कला में अति निपुण थे।

