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वीणाडमरूकवाद्यानि

वीणा और डमरू बजाना

वीणा, डमरू आदि वाद्यों को ऐसे बजाना कि स्पष्ट स्वर ( अक्षर) उनसे सुनाई दें। वादन कला के अंतर्गत वीणा और डमरू वाद्य यद्यपि परिगणित हैं, तथापि उनकी वादन कला को पृथक स्थान दिया गया है। कारण यह कि तंत्री वाद्यों में वीणा को ही सर्वप्रथम गिने जाने की परंपरा है। इसी प्रकार अवनद्य वाद्यों में शिव के प्रिय वाद्य डमरू के स्पष्टाक्षर होने के कारण डमरू को भी विशेष महत्त्व दिया गया है।

वीणाडमरूकादिवादिन्नै: अक्षराणि स्पष्टान्युच्चार्यमाणानि श्रूयन्ते ।

वीणा तंत्री वाद्य है। सबसे प्राचीन वाद्य है। वेद में इसका वर्णन है, पुराणों में यह ज्ञान की देवी सरस्वती का प्रिय वाद्य है। उनका विशेषण ही वीणावादिनी बन गया है।

डमरू अवनद्य वाद्य है, इसके बोल स्पष्टाक्षर जैसे ही होते हैं। प्रसिद्ध है कि भगवान शिव की डमरू से निकले ध्वनि रूप चौदह प्रमुख सूत्रों को माहेश्वर सूत्र कहा जाता है। आचार्य पाणिनि ने इन्हीं सूत्रों के आधार पर अपने 'व्याकरण शास्त्र' की रचना की है। इस पाणिनि व्याकरण के आधार पर बाद में महर्षि पतंजलि ने 'महाभाष्य' नामक ग्रंथ रचा था जो आज भी भाषा–शास्त्र का अद्वितीय अद्भुत ग्रंथ है।

भगवान श्रीकृष्ण वीणा वादन एवं डमरू वादन में अत्यन्त समर्थ थे। इसके उदाहरण स्वरूप देवी भागवत महापुराण में निम्नलिखित वर्णन मिलता है– एक बार कार्तिक की पूर्णिमा को श्रीकृष्ण ने राधाजी के साथ रास महोत्सव मनाया। प्रथम उन्होंने राधा की रासेश्वरी के रूप में पूजा की, फिर श्रीकृष्ण राधा के साथ विराजमान हुए। अब ब्रह्मादि देवों ने और शौनक आदि ऋषियों ने सरस्वती देवी से कृष्ण संगीत प्रस्तुत करने के लिए निवेदन किया।

उचुर्ब्रह्मादयः सर्वे ऋषयः शौनकादयः । एतस्मिन्नतरे कृष्णसङ्गीता च सरस्वती ॥ जगौ सुन्दरतालेन वीणया च मनोहरम् । तुष्टो ब्रह्मा ददौतस्यै रत्नेन्द्रसारहारकम् ॥ शिवो मणीन्द्रसारं तु सर्वब्रह्माण्डदुर्लभम् । कृष्णः कौस्तुभरत्नं च सर्वरत्नात्परं वरम् ॥
–( देवी. भा., 9/12/49,50,51 )

अर्थात् देवी सरस्वती ने कृष्ण संगीत प्रारंभ किया। उन्होंने सुंदर ताल के साथ वीणा सहित इतना मनोहर गायन किया कि वीणा वादन और संगीत से संतुष्ट ब्रह्मा ने 'रत्नेन्द्रसारहार' पारितोषक के रूप में भेंट किया। भगवान शिव ने श्रेष्ठ मणियों का हार जो ब्रह्माण्ड में अति दुर्लभ था, उसे प्रदान किया। श्रीकृष्ण ने जो इन समस्त रत्नों में सब प्रकार से श्रेष्ठ था, जो उन्हें अतिप्रिय था, उस कौस्तुभ रूपी रत्न को देवी सरस्वती को उपहार के रूप में प्रदान किया।

इससे स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण सरस्वती के वीणावादन से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने अपने हृदय पर स्थित उस अमूल्य और अद्भुत 'कौस्तुभ मणि' को ही देवी सरस्वती को उपहार स्वरूप प्रदान कर दिया।

एतस्मिन्नन्तरे शम्भुर्ब्रह्मणा प्रेरितो मुहु: जगौश्रीकृष्णसङ्गीतं रासोल्लाससमन्वितम । ध्यासने ब्रह्मा बुबुधो सर्वे तीर्थमभीप्सितम् । गतश्च राध्या सार्धं श्रीकृष्णो द्रवतामिति ॥

अर्थात् ब्रह्मा के द्वारा प्रेरित होने पर भगवान शिव ने कृष्ण संगीत प्रारंभ किया। शिव का वाद्य डमरू है, उसी पर आश्रित वह रासोल्लास का कृष्ण संगीत भगवान शिव ने प्रारंभ किया। वह इतना अधिक आनंददायी था कि श्रीकृष्ण स्वयं अपनी शक्ति रासेश्वरी राधा के संग द्रवित होकर तरल रस रूप हो गये। यह शिव के गान का प्रभाव ही था।

इससे यह भी स्पष्ट है कि भगवान श्रीकृष्ण को वीणा के स्वरों का जैसा ज्ञान था, वैसा ही ज्ञान डमरू वाद्य का भी था।