कामसूत्र में आचार्य वात्स्यायन ने आलेख्य कला की परिभाषा दी है–
रूपभेदाः प्रमाणानि भावलावण्ययोजनम् ।
सादृश्यं वणिकाभंग इति चित्रं षडंगकम ।।
ऐतानि परानुरागजननान्यात्मविनोदार्थानि च ।अर्थात् छ: अंगों से चित्र बनता है– रूप भेद, प्रमाण, भाव, लावण्य का संयोजन, समानता और कूंची की भंगिमा। इनसे मनोविनोद होता है और अन्य के प्रति या उसका अनुराग भी उत्पन्न होता है, इसलिए महाराज भोजदेव अपने ग्रंथ 'समरांगणसूत्रधार' में कहते हैं कि जैसे शरीर के अंगों में मुख प्रमुख होता है, चित्र को समस्त शिल्पों में वैसे ही चित्र प्रमुख कला मानते हैं–
चित्रं हि सर्वशिल्पानां मुखे लोकस्य च प्रियम् ।चित्त का मूल राग है, यह रस भाव को उत्पन्न कर काव्य का प्राणतत्त्व बनता है, इसलिये चित्र जगत में प्रवेश के लिये चित्त वृत्ति को राग निविष्ट होना अति आवश्यक है। सौंदर्य को पूर्णरूप में व्यक्त करने के लिये यह आवश्यक है कि चित्रकार यथाप्रदेश दृश्यों का विनिवेश करने में कुशल हो, इसके लिये चित्रकार को भावानुप्रवेश करना पड़ता है। भावानुप्रवेश करते समय चित्रकार अपनी वैयक्तिकता परिद्वार कर सकता है, वह उतना ही अधिक श्रेष्ठ कालातीत सृजन कर सकता है। इस प्रकार श्रेष्ठ चित्रकार अपनी रचना के समय सृष्टा की भूमिका में पहुँच जाता है और चित्त के द्वारा भावरस को उन्मीलित करता है।
श्रीकृष्ण ने अपने गुरु महर्षि सांदीपन से जो चौंसठ कलाएँ सीखी थीं, उनमें आलेख्य कला भी थी। श्रीकृष्ण समस्त कलाओं में अत्यंत निपुण थे, इसलिये उन्हें भक्तों ने विदाथ माधव नाम दिया था। विदाथ वो कहलाता है, जो समस्त कलाओं में पूर्ण निपुण होता है। 'भक्ति रसामृत सिन्धु' नामक भक्ति ग्रंथ में उनके विषय में कहा है कि –
गीतं गुम्फति ताण्डवं घटयति ब्रूते प्रहेलीक्रमं, वेणुं वादयते स्रजं विरचय व्यालेख्यमभ्यस्थति ।
निर्सांति स्वर्यामन्द्रजालपटलीं द्यूते जयत्युन्मद्रान्, पाशयोद्यामकलाविलासवसञ्छित्तं हरि: क्रीऽति ॥प्रस्तुत श्लोक में आलेख्य कला का स्पष्ट उल्लेख है।

