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नृत्य

अभिनय

  • नृत्य / नृत्त कला
  • नृत्त

यद्यपि संगीत से नृत्य कला का समावेश भी हो जाता है, तथापि इसका शास्त्रों में अलग से वर्णन भी मिलता है। आचार्य धनंजय ने केवल लय पर आश्रित अंगों के संचालन को 'नृत्त' कहा है तथा जिसमें लय और अंग संचालन के सहित भावों को, विचारों को विभिन्न मुद्राओं के द्वारा प्रदर्शित किया जाये, वह 'नृत्य' कहा जाता है। सामान्य तौर पर शास्त्रों के अतिरिक्त भी नृत्य शब्द का प्रयोग होता है। नृत्य, हृदय के भावों और अनुमितिओं को शरीर संचालन और मुद्राओं द्वारा अभिव्यक्त करता है। सारे शरीर का लयात्मक गति पूर्ण विक्षेप होता है। चार प्रकार के उपकरणों द्वारा इसे व्यक्त करते हैं- आहारी, सात्विक, वाचिक और आंगिक क्रिया। आहारी में अभिव्यक्ति के अनुसार वस्त्र विन्यास होता है। सात्विक में मुद्राओं द्वारा भावों की अनुभूति को व्यक्त करते हैं। आठ भाव प्रमुख माने गये हैं- स्तम्भ, श्वेध, रोमांच, स्वरभंग, वैवथु:, वेंविण्य, अश्रु , प्रलय। यह वाचिक अभिनय कथोपकथन के अभिनय द्वारा व्यक्त होता है तथा शरीर के विभिन्न भागों द्वारा आंगिक नृत्य द्वारा व्यक्त होता है। शास्त्रीय नृत्य में अंगुलियों की मुद्राएँ, भौंहों का संचालन तथा चेहरे की मुद्राओं का अतिसूक्ष्मता से व्यक्त करने का कौशल प्राप्त करने के लिए नृत्य की शिक्षा गुरु की कृपा तथा कठोर अभ्यास पर निर्भर करती है। नृत्य की चर्चा वेद में मिलती है। यजुर्वेद के तीसवें अध्याय में नृत्य के साथ वाद्ययंत्रों का और वादक का वर्णन अनेक बार आया है।

ऋग्वेद की शाखा के अंतर्गत नाट्य से संबंधित नट सूत्रों को पढ़ाया जाता था। इसके आचार्य थे शिलालि और कृशाश्व। इस प्रकार वैदिक काल में भी नाट्य विद्या का पूर्ण सम्मान था। अभिनेता के लिए 'नट' शब्द और अभिनेत्री के लिए 'नटी' तथा उनकी सन्तान के लिए 'नटेर' शब्द उपयोग होता था। संगीत नाट्य का अंग था। जहाँ नट अभिनय करते थे, उस स्थान को रंगस्थल कहते थे, रंग स्थल पर केन्द्रमुख वेदी होती थी। वेदी के पास में ही एक स्थान और होता था जहाँ ग्रँथिक बैठता था। वेदी पर नट अभिनय करता था तथा ग्रंथिक कथा प्रसंगों को जोड़ता था, इस प्रकार से नाट्य संपन्न होता था।

श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि भगवान श्रीकृष्ण षोडश कलाओं को लोक में शिक्षित करने हेतु अवतरित हुये थे।

जगृहे पौरुष रूपं भगवान महदादिभि: । सम्भूतं षोडशकलामादौ लोकशिसृक्ष्या ॥

प्रश्नोपनिषद् में कहा है-

तस्मै द्रोवाच इहैवान्त: शरीरे हृदय पुण्डरिकाकाश मध्ये हे सौम्य। सः पुरुषः न देशान्तरे विज्ञेयो यस्मिन एता उच्चामानाः षोडशकलाभिरुपाधिरूपाभि: सकल इव निष्कल: पुरुषो लक्ष्यते।

तात्पर्य यह है कि शरीर में हृदय कमल के मध्य में जो पुरुष स्थित है, वह षोडश कलाओं से युक्त है। यद्यपि वह पुरुष निष्फल है, फिर भी वह सोलह कलाओं की उपाधि से सकल लक्षित होता है। श्रीकृष्ण यद्यपि स्वयं भगवान हैं, निष्फल हैं, फिर भी वे समस्त कलाओं से युक्त सकल कलानिधि के रूप में लक्षित हैं। भागवत कहती है कि वे नटवर प्रभु हैं। वे ताल मान, रसाश्रय, विलास, अंग विक्षेप से युक्त नृत्य में निपुण हैं। वे ताण्डव, नटन, नाट्य, नृत्य लास्य आदि के अनेक भेदों के कुशल अभिनेता हैं। वे अपने सखा-सखियों के साथ घिरे हुए राधिका के साथ 'लास्य नृत्य' करते रहते हैं। उनका यह स्वभाव है, इसलिये तो वे कालीय विषधर के भी सिर पर अपना अद्भुत रस रूप ताण्डव रचाते हैं, जिसे देख कर गंधर्व, सिद्ध, देवता चारण और अप्सराएँ आनंदपूर्वक मृदंग, पणव, आनख आदि वाद्य बजाते हैं, गीत गाते हैं, पुष्प भेंट करते हैं। व्यास जी इस चित्र को शब्दों द्वारा इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं-

एवं परिभ्रमहतौजसमुन्नतांसमानम्य तत्पृथुशिर: स्वाधि रूढ आद्य:। तन्मूर्धरत्न निकरस्पर्शातिताम्र पादाम्बुजोऽखिलकलादिगुरुर्ननर्त ॥
- (श्रीमद्भागवत10/16/26)

अर्थात् श्रीकृष्ण के नृत्य से वह कालिया नाग जो अत्यन्त व्याकुल हो चुका था, उसकी नाक से विष बह रहा था, आँखें अवां (भट्टे) के समान तप्त हो रही थीं। अत: वह अपनी दो जीभों से अपने गलफड़ों को चाट रहा था। ऐसे में श्रीकृष्ण के उसके फनों पर भ्रमण करने से जब उस नाग का पराक्रम नष्ट हो गया तो उसके वह उठे हुए फन कुछ नीचे हो गये। अब वे श्रीकृष्ण जो आदिपुरुष हैं, उन मोटे-मोटे सिरों पर चढ़कर (जो हिल रहे हैं), उन पर नृत्य करने लगे। भगवान श्रीकृष्ण संपूर्ण कलाओं के आदि गुरु हैं। वे अब नृत्य करने लगे। भगवान के चरण अत्यन्त अरुण कान्ति सम्पन्न अंग हैं। उनकी उस अरुणाई से नाग के सिर पर स्थित मणियाँ अपनी अरुण कांन्ति फैला रही हैं। इस प्रकार का नृत्य कालिया नाग के फनों के ऊपर भगवान श्रीकृष्णजी कर रहे हैं।

यह श्रीकृष्ण के नृत्य का ताण्डव चित्रण था। अब व्यास जी की तूलिका से रचा गया रस प्रधान चित्र का अवलोकन किया जाए। रास प्रारम्भ हो गया है। भगवान श्रीकृष्ण गोपियों की मण्डली के बीच नृत्य कर रहे हैं। पूरा वातावरण नृत्यमय हो गया है। वेद व्यास जी कहते हैं–

कर्णोत्पलालकविटङ्कपोल धर्म वक्त्र श्रियो वलयनूपुर घोषवाद्यै: । गोप्य: समं भगवता ननृतु: स्वकेश स्रस्त स्रजो भ्रमरगाय करा सगोष्ठ्याम् ॥
– भाग. ( 10/33/16 )

वहाँ गन्धर्व और किन्नर जो बाजे बजाते थे, गान करते थे, वे रस से आवेशित होकर, मोहित हो नृत्य में लग गये तो उनकी स्त्रियों के कंकण व नूपुर वाद्यों का कार्य करने लगे और वहाँ गूँजते भवरों ने गवैयों के स्थान पर गाने का कार्य संभाल लिया। रास मण्डली में जो गोपियाँ नृत्य में श्रीकृष्ण का साथ दे रही थीं, श्रम से उनके कोमल कपोलों को स्वेद बिन्दु अलंकृत करने लगे। नृत्य करते समय जो फूलों की माला गिर जाती थी, तो ऐसा लगता था कि ताल की गति से प्रसन्न हो सिर हिला–हिलाकर पुष्प ही स्वयं भगवान के चरणों पर गिर रहे हैं।