कामसूत्र के अनुसार चित्राश्च योग कला की व्याख्या इस प्रकार है–
नाना प्रकार दौर्भाग्यै केन्द्रिय पलीतीकरणादय: ।
ईर्ष्यया परातिसन्धानार्था: तानौपनिषदिके वक्ष्यति ॥चित्र योग: अर्थात् असामान्य एवं अद्भुत प्रयोग, जिनको गुप्त रूप से प्रयुक्त किया जाता है। इसमें मंत्र–यंत्र और गुप्त औषधियों का प्रयोग किया जाता है। कामसूत्र में इसे चित्रयोग कहा है। आयुर्वेद में इसे प्रकृति से प्राप्त गुप्त औषधियों का प्रयोग बताया है और कहा गया है कि इन गुप्त प्रयोगों के लिए औषधियों के साथ वैदिक मंत्रों का प्रयोग आवश्यक है। प्रकृति में प्राप्त वनस्पतियों के पत्ते, जड़ें, पुष्प, फल, बीज, तने आदि का व्यवहार मनुष्य और पशुओं के रोगों को दूर करने में किया जाता है। ऋग्वेद में इस प्रकार की औषधियों का वर्णन पाया जाता है तथा अथर्ववेद में भी औषधियों का मंत्रों के साथ रोगों के दूर करने के लिए उपयोग बताया गया है। यथा– ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के सूक्त क्रमांक 191 में सूर्य किरण चिकित्सा का वर्णन है। ऋग्वेद सूक्त 10/163/1–6 में यक्षमा रोग दूर करने की विधि, सूक्त 7/47/1–1 में जल चिकित्सा, सूक्त 5/78 वें सूक्त में स्त्री के गर्भ को असमय गिरने से रक्षा का उपाय हैं। इसी प्रकार ऋग्वेद के सूक्त 10/145/2–3 में उत्तान–पर्णी औषधि के गुणों का वर्णन है। अथर्ववेद में तो बालों को गिरने से बचाने और पति–पत्नी के बीच सौमनस्य स्थापित करने का भी वर्णन है।
श्रीकृष्ण इस कला में पूर्ण रूप से निपुण थे। उन्होंने स्पष्ट रूप से श्रीमद्भगवत गीता में कहा है कि– मैं वेदों में सामवेद हूँ ('वेदानां सामवेदोस्मि' ( 10/22 ) और महर्षियों में मैं भृगु ऋषि हूँ 'महर्षिणां भृगुरहम' ( 10/24 ) अर्थात् ऋषियों में भृगु हूँ। इसका तात्पर्य यह है कि गायन वाले मंत्र अधिक शक्तिशाली होते हैं, वह श्रीकृष्ण की विभूति हैं। इसी प्रकार महर्षि भृगु तंत्र और आगम विद्या के सबसे बड़े जानकर माने जाते हैं, वह भी श्रीकृष्ण की ही विभूति हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण आगम विद्या अर्थात् चित्राश्च योग के पूर्ण ज्ञाता हैं।

