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माल्यग्रंथन

माला गूंथना

कामसूत्र के अनुसार माल्य ग्रंथन कला की व्याख्या इस प्रकार है–

माल्यानां मुण्डमालादीनां देवता पूजनार्थ, नेपथ्यानां ग्रन्थनविकल्पा: ।।

माला के गूँथने की कला माल्य ग्रंथन है। इस कला में श्रँगार और देव पूजन दोनों अवसरों का विनियोग होता है। पुष्पों की माला से केशों को बाँधा जाता था, मोतियों अथवा पुष्पों की माला को कंठ में पहना जाता था। इष्ट देव को भी माला ग्रंथन कर अर्पित किया जाता था। विशेष अवसरों के लिए भी अलग–अलग मालाओं का विधान है, यथा– वैजयन्ती की माला, जो तुलसी कुन्द, मन्दार, पारिजात और कमल के पुष्पों से बनाई जाती थी और कदम के पुष्प का सुमेरू लगा होता था, यह माला भगवान विष्णु को अर्पित की जाती है तथा सफेद अर्क के पुष्पों की माला भगवान शिव को अर्पित की जाती है। पुराणों में आया है कि पार्वती ने कमल के बीज जिन्हें पद्माक्ष कहते हैं, उनकी माला बनाकर भगवान शिव के गले में पहनाई थी।

ऋग्वेद के श्रीसूक्त में आया है कि श्री देवी के गले में कमल की माला शोभा पाती है, उन्हें कमल पुष्प अति प्रिय है। श्रीमद् भागवत पुराण में आता है कि श्रीकृष्ण की माँ यशोदा को मल्लिका पुष्प बहुत प्रिय थे। स्वयं श्रीकृष्ण कदम्ब अथवा नीप जो कदम्ब की ही एक किस्म है, उनके पुष्पों की माला बनाकर स्वयं पहनते थे।

बर्हापीडं नटवर वपु: कर्णयो: कर्णिकारं । बिभ्रद्वासः कनक कपिशं वैजयन्तीं च मालाम् ॥ रन्ध्रान वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै । वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद्गीत कीर्तिं: ॥
– ( श्रीमद्भागवत पु. 10/21/05 )

स्पष्ट है कि माल्य ग्रंथन कला में श्रीकृष्ण निपुणता प्राप्त हैं। वे कानों में कर्णिका की झूलती हुई मंजरियाँ और गले में वैजयन्ती माला ( तुलसी मंजरी, कुन्द, पारिजात के प्रसून, तथा नीलकमल के पुष्पों से युक्त), जिसमें सुमेरू के स्थान पर कदम्ब अथवा नीप के पुष्पों की बनी हुई माला पहनकर वृन्दावन में वेणु वादन करते हुए गोप वृन्दों के साथ प्रवेश कर रहे हैं।