ऋग्वेद के वाक्यार्थ को समझने का शास्त्र मीमांसा है। यह विद्या और वेद के वचनों को समझाने के लिए एक स्वतंत्र शास्त्र है। इसमें माना गया है कि
उपक्रमोय सहारु.....
अभ्यासो पूर्वता फलं अर्थवोपपत्ति च लिंग तात्पर्य निर्णये।'उपक्रम' का अर्थ है- आरम्भ और उपसंहार, अभ्यास, फल (परिणाम), अर्थवाद (दृष्टान्त) तथा उपपत्ति (प्रमाणों द्वारा सिद्धि) इन छ: मुद्दों पर मीमांसक लोग वेद के वचनों को विचार करने के बाद उसका तात्पर्य निर्णय करते हैं। इस प्रकार पहले हम देखते हैं कि प्रारम्भ कैसे हुआ और अन्त कैसे हुआ; फिर देखते हैं कि बार-बार इस कथन का क्या अभिप्राय है, कौन-सी बात बार-बार आई है? इसके अन्तर में देखते हैं कि इस वाक्य में क्या नवीनता है? फिर विचार करते हैं कि इस वाक्य में परिणाम क्या बताया गया है? इसके बाद विचार किया जाता है कि उदाहरण कौन-से और किस प्रकार दिए गये? इस 'उपक्रम' के आधार पर विचार करते हैं कि इन सब प्रमाणों से क्या सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया है? अन्त में मीमांसक निर्णय करता है कि वेद के इस वाक्य का तात्पर्य क्या है? इस मीमांसा शास्त्र का विचार विद्वानों को ऋग्वेद के नारदीय सूक्त में स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। इसी प्रकार ऋग्वेद के प्रसिद्ध सूक्त 'माया-भेद' में भी मीमांसा के बीज मीमांसकों को दृष्टिगत होते हैं।

