चौदह विद्याओं में 'पुराण' का नाम सर्वप्रथम है। वायु पुराण में कहा गया है कि-
पुराणं सर्व शास्त्रणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम्।
अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गता:।।- सब शास्त्रों में पहले ब्रह्मा ने पुराण का स्मरण किया और उसके अनन्तर उनके मुख से वेद प्रकट हुए। व्याकरण के अनुसार -'पुरा भवम् पुराणं' अर्थात् पुरानी घटनाएँ पुराण हैं। तात्पर्य यह है कि सृष्टि रचना के पूर्व ही ब्रह्मा ने प्रकृति के चरित्र को मनोगत कर लिया, तब देव, मनुष्य आदि को अपने अनुकूल बनाने की विधि व्यक्त की। इसीलिए अथर्ववेद में पुराण शब्द दो बार (11/7/24) और (15/6/8-12) आता है, जो इस बात का प्रमाण है कि- पुराणों में वर्णित कुछ घटनाएँ वेद से भी पूर्व काल की हैं। इसलिए अथर्ववेद इनका आदर के साथ उल्लेख करता है। इसी प्रकार पुराणों के कुछ कथानक या उनके बीज वेदों में प्राप्त होते हैं। ऋग्वेद में रामायण के अनेक पात्रों का वर्णन आया है, जैसे- इक्ष्वुवाक, दशरथ और राम। शुन:शेप और विश्वामित्र की कथा के बीज भी ऋग्वेद में मौजूद हैं।
नाभानेदिष्ट की कथा जो पुराणों में आती है उसके बीज भी ऋग्वेद (10/61) में हैं। श्रृजातिम और अंगिरा के कथानक का स्रोत भी ऋग्वेद में है। इसके अलावा वेद में वर्णित अनेक सूक्ष्म तत्त्वों के स्वरूप को जिन्हें पुराणों ने कथानक का विस्तृत रूप दिया है, वे बीज भी यहाँ मौजूद हैं। पुराणों में कलाओं के 64 रूपों का वर्णन मिलता है, परन्तु उनके नाम विभिन्न कालों में भिन्न-भिन्न होने से संगति नहीं बैठाई जा सकती, जैसे भागवत में 64 कलाओं में से अधिकांश कलाओं के उदाहरण तो दे दिए गये हैं, पर इसके बावजूद यह हमें स्पष्ट रूप से समझना होगा कि दिए हुए उदाहरणों में से कुछ ही कलाओं के नाम वहाँ वेदव्यास जी ने दिए हैं। शेष बची हुई कलाओं का वर्णन तो है, परन्तु उनके नाम श्रीमद्भागवत में कहीं प्राप्त नहीं होते, क्योंकि यह पुराण सत्य की खोज में लिखा गया पुराण है, कला शास्त्र नहीं। इसी प्रकार अग्नि पुराण, मत्स्य पुराण, विष्णु पुराण, स्कन्द पुराण और ब्रह्म पुराणों में अनेक प्राचीन कलाओं के वैज्ञानिक वर्णन मिलते है, उनकी छान-बीन की गई हैं पर उनके वे नाम नहीं हैं, जो आचार्य श्रीधर और वात्स्यायन के व्याख्याकार ने दिए हैं। श्रीमद्भागवत में ही पुराणों के जो पंच लक्षण एवं दस लक्षण दिए गये हैं, उन लक्षणों में कहीं भी इस बात का उल्लेख नहीं है कि- पुराणों में कला एवं विद्याओं के नाम और वर्णन हैं। पुराणों के अध्ययन से स्पष्ट है कि उनमें व्यास जी ने भारत में व्याप्त समस्त ज्ञान का मंथन करके लोक और वैदिक ज्ञान को कथाओं आख्यानों गाथाओं के रूप में पुराणों में वर्णन किया है। उद्देश्य था- वेद के गुह्य ज्ञान और लोक में व्याप्त विज्ञान का सबके लिए सरल और सुग्राह्य रूप में (उस ज्ञान की) विरासत को प्राप्त कराना। इस दृष्टि से पुराणों का वर्तमान में भी अध्ययन होना, लोक-मंगल का कारण हो सकता है, इस दिशा में प्रयत्न होना चाहिए।

