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नेपथ्य प्रयोग

वेशभूषा धारण करना

कामसूत्र के अनुसार नेपथ्य प्रयोग कला की व्याख्या इस प्रकार है–

देशकालापेक्षया वस्त्रमाल्याभरणादिभि: शोभार्थं शरीरस्य मण्डनाकाराः ॥

देशकाल के अनुसार वेशभूषा धारण करने की कला को नेपथ्य कला कहा जाता है।

श्रीमद्भागवत में वर्णन आता है कि आश्रमवासी वल्कल वस्त्र धारण करते थे तथा आश्रम की कन्याएँ विवाह के अवसर पर रेशमी वस्त्र पहनती थीं। सामान्य घरों की नववधुएँ स्वर्ण आभूषण पहनती थीं, पैरों में लक्षारस लगाया करती थीं, सामान्यत: विवाह के अवसर पर कौशेय वस्त्र पहनने की परम्परा थी। श्रीकृष्ण इस रूप–सज्जा में अति निपुण थे। श्रीकृष्ण के श्रँगार के विषय में अत्यन्त सुन्दर वर्णन श्रीमद्भागवत में प्राप्त होता है– व्यास जी के अनुसार श्रीकृष्ण ने अपने आपको इस प्रकार अलंकृत किया है–

श्यामं हिरण्य परिधिं वनमाल्यबर्ह धातुप्रवालनटवेष मनु व्रतां से । विन्यस्त हस्तमितरेण धुनानमब्जं कर्णोत्पला लककपोल मुखाब्जहासम् ॥
– श्रीमद्भागवत ( 10/23/22 )

अर्थात् श्रीकृष्ण श्याम वर्ण के कलेवर पर सुवर्ण तुल्य पीताम्बर और वनमाला धारण किये हैं। मयूर पिच्छ तथा अभिनव अंकुरों से शिरोभाग अलंकृत है। श्रीकृष्ण ने कानों में कमल के कुण्डल धारण किए हैं, कपोलों पर अलंकृत वलि शोभित हो रही है। उनके एक हाथ में कमल पुष्प है, जिसे वे नचा रहे हैं।

बर्ह पीडं नटवरवपु: कर्णयो: कर्णिकारं। बिभ्रद्वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम् ॥
– श्रीमद् .भाग.( 10/21/5 )

अर्थात् श्रीकृष्ण ने मस्तक पर मयूर पिच्छ धारण कर लिया है, कानों में कर्णिकार की मंजरियाँ झूल रही हैं, सुवर्ण तुल्य पीतवर्ण का पीताम्बर धारण किया हुआ है तथा गले में वैजयन्ती माला झूल रही है। उक्त दोनों चित्र नेपथ्य कला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। इनसे स्पष्ट होता है कि उस अवस्था में जो सर्वोत्तम वस्त्रों और आभूषणों का वय और वातावरण के अनुसार चयन किया जा सकता था, वह चयन करके श्रीकृष्ण ने अपना श्रँगार किया।