वैदिक साहित्य विश्व का प्राचीनतम साहित्य है और ऋग्वेद इस साहित्य का प्राचीन, विशाल एवं सर्वमान्य ग्रंथ है। भारतीय लोगों ने अपने वैदिक जीवन के प्रारम्भ में किस प्रकार से समाज का विकास किया और धर्म, दर्शन, ज्ञान, विज्ञान, कला, साहित्य में प्रगति की तथा इन सबके द्वारा उन्होंने मानव के हित में क्या योगदान दिया, इन सबका मूल दस्तावेज ऋग्वेद है। इसमें न केवल हमारे समाज की सांस्कृतिक निधि सुरक्षित है, अपितु मानवता के विकास के इतिहास में भी इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह प्राचीनतम ग्रंथ अपने में सहस्त्रों वर्षों के इतिहास को बीज रूप में रखे हुए है। इसमें अनेक ऐसे विषयों की चर्चा है जिनका मानव जीवन के साथ साक्षात् संबंध है।
ऋग्वेद की ऋचाओं में प्रधानत: देवताओं की स्तुतियाँ संग्रहीत हैं। प्राचीन समय में इस वेद की इक्कीस शाखाएँ थीं, ऐसा महर्षि पतंजलि ने अपने ग्रंथ 'महाभाष्य' में कहा है, किन्तु आजकल केवल एक शाखा 'शाकल' नाम की ही उपलब्ध है। शाकल ऋषि मंत्रों के 'पदपाठ' के प्रवर्तक थे, उन्होंने ही पदों में संधि-विच्छेद करके 'पदपाठ' की रीति चलाई थी। ऋग्वेद की यह शाकल शाखा वैदिक साहित्य में रत्न है। इस शाखा का महत्त्व इसलिए भी है कि इस 'शाकल' शाखा के मंत्रों से सामवेद की 'कौथूमी' शाखा बनी है। इस 'कौथूमी शाखा' में शाकल शाखा के 75 मंत्रों को छोड़कर जितने मंत्र हैं, वे सब इसी शाखा के हैं। इसी प्रकार कृष्ण-यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा और शुक्ल यजुर्वेद के वाजसनेयी संहिता में बहुत से मंत्र इसी ऋग्वेद की शाकल शाखा के हैं। अथर्ववेद की शौनक संहिता में भी 1200 मंत्र इसी शाकल शाखा के हैं। इस प्रकार ऋग्वेद की इस शाखा के अन्तर्गत प्राय: तीन वेदों का बड़ा हिस्सा आ जाता है। इसलिए यदि कोई विधिपूर्वक ऋग्वेद का ही (इस शाखा का) अध्ययन करे तो चारों वेदों का स्वाध्याय हो जाता है।
ऋग्वेद की इस शाखा का विभाजन दो रूपों में मिलता है। एक विभाग के अनुसार अष्टक अध्याय और वर्ग होते हैं तथा एक वर्ग में सामान्यत: पाँच मंत्र होते हैं। दूसरे के अनुसार- समूचे ऋग्वेद में दस मण्डल, पचासी अनुवादक और दस सौ सत्रह सूक्त हैं। 'बाल-खिल्य' के ग्यारह सूक्त पृथक हैं। इन्हें मिलाकर सूक्तों की संख्या एक हजार अट्ठाईस है। एक सूक्त में एक से लेकर पचासी तक और सामान्यत: दस मंत्र होते हैं। इस प्रकार ऋग्वेद में कुल मंत्रों की संख्या दस हजार चार सौ बहत्तर है, लेकिन शौनक ऋषि की 'अनुक्रमणिका' के अनुसार दस हजार पाँच सौ अट्ठाईस मंत्र हैं। मंत्रों की रचना छन्दों में है। वैदिक छन्द लगभग साठ प्रकार के हैं, किन्तु इनमें सात छन्द विशेष प्रसिद्ध हैं- गायत्री, उष्णिक, त्रिष्टुप, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति और जगती छन्द। मंत्रों के दृष्टा-ऋषि हैं। इनकी संख्या लगभग तीन सौ है, किन्तु इन तीन सौ मंत्र दृष्टाओं में से गृत्समद ऋषि, विश्वामित्र, वामदेव, अत्रि, भरद्वाज, वशिष्ठ, कण्व और अंगिरस अधिक प्रसिद्ध हैं। पहले, नौवें और दसवें मण्डलों में अनेक मंत्र-दृष्टा ऋषियों के मंत्र संग्रहीत हैं। दूसरे मण्डल में गृत्समद, तीसरे में विश्वामित्र, चतुर्थ में वामदेव, पंचम में अत्रि, षष्ठम् में भरद्वाज, सप्तम में वशिष्ठ, अष्टम् में कण्व ऋषि के और उनके वंशजों के मंत्र संग्रहीत हैं। ऋषि बहुधा ब्राह्मण होते थे, कुछ राजर्षि, वैश्य और कुछ अन्य वर्ण के ऋषि भी हुए हैं। ऋग्वेद में कुछ सूक्तों और मंत्रों की दृष्टा स्त्रियाँ भी हैं। इनमें सत्ताईस महिला मंत्र-दृष्टा प्रमुख हैं। इनके मंत्रों का संग्रह और भाष्य करने का सुयोग इन पंक्तियों के लेखक को भी मिला है। इन दृष्टा ऋषिकाओं में जुहू, शची, घोषा, लोपामुद्रा, विश्ववारा, यमी, दक्षिणायिनी सूर्या, अपाला, रोमशा, इन्द्राणी, सार्पराज्ञी आदि हैं।
ऋग्वेद में देवताओं की स्तुतियाँ संग्रहीत हैं। ऋषियों ने यह अनुभव किया था कि इन्द्र, अग्नि, सूर्य आदि में अद्भुत शक्ति, ऐश्वर्य और प्रभुता है, उन्हीं के द्वारा सृष्टि का क्रियाकलाप संचालित होता है। अत: इन तत्त्वों को चेतन तत्त्व मान कर उपासना का विधान किया गया है। बृहद देवता और यास्क के निरुक्त आदि ग्रंथों में इन देवताओं के स्वरूप का विचार किया गया है। यास्क के निरुक्त के अनुसार देवता तीन प्रकार के हैं- पृथ्वी-स्थानीय, अन्तरिक्ष-स्थानीय और द्यौ-स्थानीय। पृथ्वी स्थानीय प्रधान देवता 'अग्नि' है, अन्तरिक्ष स्थानीय 'वायु' अथवा 'इन्द्र' और द्यौ स्थानीय प्रधान देवता 'सूर्य' है। इन्हीं की अनेक रूपों तथा नामों से स्तुति की गई है। ऋग्वेद के एक मंत्र से पता चलता है कि 'पृथ्वी स्थानीय, अन्तरिक्ष स्थानीय और द्यौ स्थानीय कुल मिलाकर तैंतीस देवता हैं'।
ये देवासो दिव्ये काद शस्थ पृथिव्यामध्ये काद शस्थ।
अप्सुक्षितो महिनैकादशस्थ ते देवासो यज्ञमिमं जुषध्वम्।।आचार्य सायण ने भी तैंतीस देवता का उल्लेख किया है। पृथ्वी स्थानीय देवताओं में अग्नि, सोम, नदी, समुद्र, आदि तथा अन्तरिक्ष स्थानीय देवताओं में इन्द्र, वरुण, रुद्र, मरुत आदि देवताओं का वर्णन है। द्यौ स्थानीय देवताओं में द्यौ, सूर्य, विष्णु, रुद्र, अश्विनौ, उषा, सोम प्रधान हैं, इसके अतिरिक्त कुछ भावात्मक देवता भी हैं- श्रद्धा, मनु, धात्री, अदिति आदि। यास्क के अनुसार कुछ ऐसे भी पदार्थ हैं, जो देवता नहीं है, पर देवता के समान मानकर उनकी स्तुति की गई हैं- ऋभु, अप्सरा, गंदर्भ, गौ, औषधि आदि। इस प्रकार ऋग्वेद में लगभग 79 देवताओं की स्तुतियाँ हैं। भारतीय आर्य लोग प्रत्येक जड़ पदार्थ को भी एक चेतन अधिष्ठाता देवता मानते थे। उस जड़ पदार्थ में स्थित चेतन तत्त्व की स्तुति उन्होंने की है।
ऋग्वेद के देवों में 'इन्द्र' और 'अग्नि' प्रधान देवता माने गये हैं। इन्द्र अन्तरिक्ष का देवता है, उसके लिए लगभग दो सौ पचास सूक्त हैं। इन मंत्रों में इन्द्र को परमात्मा, आत्मा, वीर और विद्युत आदि कहा है। इन्द्र अत्यन्त शक्तिशाली, मेघों का संचालक, वज्रधारी असुर संहारक है। वृत्र नामक असुर के साथ इन्द्र के युद्धों का सुन्दर और विशद वर्णन है। यास्क के अनुसार वृत्र का अभिप्राय मेघ से है। इन्द्र इन मेघों को प्रेरित कर वर्षा करता है। ऋग्वेद के इन मंत्रों में दर्शाया गया है कि उसने वृत्ररूप सर्प जो मेघ है, उसका वध किया, पृथ्वी पर जल बहाया और पर्वतों से नदियों को प्रवाहित किया-
इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचं यानि चकार प्रथमानि वज्री।
अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्रवक्षणा अभिनत् पर्वतानाम्।।ऋग्वेद में इन्द्र को विभु अर्थात् व्यापक, विश्वज्ञाता, सर्वश्रेष्ठ देवता, स्वयं प्रकाशवान, अमर धर्म विधायक, अच्युत आदि कहा है। इस प्रकार इन्द्र ऋग्वेद का विशेष प्रतिपाद्य देवता है। अग्नि, पृथ्वी का प्रधान देवता है। अग्नि, देवों एवं मनुष्यों के बीच में संबंध स्थापित करने वाला है। ऋग्वेद में इन्द्र के बाद अग्नि के सूक्त सबसे अधिक लगभग दो सौ हैं। अग्नि प्रकाशमान देवता है, पुरोहित है, होता और ऋत्विक है। अग्नि संपत्तियों का स्वामी है, यथा-
अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।
होतारं रत्नधात मम्।अग्नि की बड़ी महिमा गायी गई है। वह मरण धर्म वाले प्राणियों में प्रकाश, ज्ञानोत्पादक और शरीर रक्षक है। सप्तऋषि तथा देवों का मुख है। उसी के द्वारा देवताओं को बुलाया जाता है और हवि पहुँचाई जाती है। इसके प्रमुख तीन रूप हैं- गार्हपत्थ, आहवनीय और दक्षिणाग्नि जो अति प्रसिद्ध हैं। अग्नि ही आकाश में 'सूर्य' है, अन्तरिक्ष में 'विद्युत' है, और पृथ्वी पर 'पार्थिव' है। इसके अलावा और भी अनेक प्रकार की अग्नियाँ हैं।
इन्द्र और अग्नि के अलावा सोम के संबंध में सबसे अधिक मंत्र हैं। सम्पूर्ण नौवाँ मण्डल 'सोम' की स्तुति से संबंधित है। सोम को- औषधीश, चन्द्र, अमृत, पवमान आदि कहा गया है। इसके अलावा 'द्यौ' देवताओं में सबसे प्राचीन है, 'उषा' उसकी अग्रगामिनी है। वह 'देवकी' की कन्या और रात्रि की बहिन है। वरुण भौतिक और आध्यात्मिक जगत का 'नियामक देवता' है। उसी के प्रताप से सूर्य-चन्द्रमा प्रकाश पाते हैं, वर्षा होती है, नदियाँ बहती हैं। वरुण सर्वज्ञ है।
ऋग्वेद में अनेक देवताओं की पृथक-पृथक स्तुति देखकर कुछ विचारकों का यह मत बना है कि- ऋषियों को 'परमात्मा' का ज्ञान नहीं था। वे केवल प्राकृतिक शक्तियों में शक्ति देखकर 'चेतन देवता' समझते थे, यह धारणा निराधार है। ऋग्वेद के अनेक मंत्रों में आया है- 'महत् देवानाम् असुरत्वं, एकम।' अर्थात् -देवताओं की शक्ति एक ही है, दो नहीं। ऋषि समझते थे कि- 'ये सब देवता एक ही परमात्मा के विविध रूप हैं। उनका कहना था- 'एकम् आत्मा वहुधा स्तुयते।' इस ब्रह्माण्ड में एक ही देव शक्ति है, उसे 'परमात्मा' कहते हैं। वही विद्यमान है।
विश्व के लिए ऋग्वेद- 'ज्ञान, विज्ञान और ऐतिहासिक तत्त्वों के सांस्कृतिक मूल्यों की धरोहर है।' ऋग्वेद के लगभग बाइस सूक्तों में 'दान' की महिमा है। ये दान स्तुतियाँ प्ररोचना हैं। इनमें प्रबंध काव्य एवं नाटकों के साथ संबंध जोड़ने वाले तत्त्व मिलते हैं। जैसे- पुरुरवा और उर्वशी संवाद (10/85), यम-यमी संवाद (10/10), सरमापणि संवाद (10/130)। पुरुरवा और उर्वशी की कथा प्रेम का प्राचीनकालिक निर्देशन है। स्वर्ग की अप्सरा पृथ्वी के मानव से विवाह करती है। इसी प्रकार यम-यमी संवाद में यमी भाई यम से संबंध स्थापित करना चाहती है, किन्तु भाई यम चारित्रिक औदात्त से बहिन को मर्यादित रहने की सीख देता है। ऋग्वेदीय सामाजिक विशेषता इसमें प्रस्तुत है। इसी प्रकार सरमापणि संवाद भी है।
ऋग्वेद में गंभीर चिन्तन के कुछ विशेष स्थल हैं, जैसे- अघमर्षण सूक्त (10/190/1-3), अस्यवामीय सूक्त (1/164/150), नासदीय सूक्त (10/129/1-7), तरत-समंदीय ऋचाएँ (9/58/104), हविषपाणीय सूक्त (10/88/112), पवमानीय ऋचाएँ (9/67/1-32)। इसके अलावा हिरणगर्भ सूक्त और पुरुष सूक्त जो अति प्रसिद्ध हैं। वाक् सूक्त और सार्पराज्ञी सूक्त जो ऋषिकाओं द्वारा कहे गये हैं, वे भी महत्त्वपूर्ण दिशा को सूचित करते हैं। श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कन्द के इक्कीसवें अध्याय के अन्तर्गत श्लोक क्रमांक पैंतीस से तैंतालीस तक नौ श्लोकों में वेद के विषयों को अति संक्षेप में और बहुत ही गंभीरतापूर्वक श्री वेदव्यास जी ने समझाया है। वहाँ अन्त में श्री भगवान ने उद्धव से कहा है कि श्रुति के रहस्य को मेरे अतिरिक्त कोई भी नहीं जानता है। मैं तुम्हें स्पष्ट बतलाता हूँ कि सभी श्रुतियाँ कर्मकाण्ड में मेरा ही विधान करती हैं -उपासना काण्ड में देवताओं के रूप में वे मेरा ही वर्णन करती हैं। ज्ञान काण्ड में आकाश आदि रूप से मुझमें ही दूसरी वस्तुओं का आरोप करके उनका निषेध कर देती हैं।
ऋग्वेद में विभिन्न विद्याएँ एवं कलाएँ
ऋग्वेद संहिता में मूल रूप से 'कला' शब्द आया है यथा- 'कलां यथा शपं यथा ऋणं सन्नयामिसि'। (1/47/17 मंत्रों में अनेक विद्याओं के संदर्भ मिलते हैं, जिन्हें आज या पौराणिक काल में 'कला' शब्द की संज्ञा द्वारा जाना गया था। जैसे-
रथ चलाने की कला / विमानन
अश्विनौ के रथ, अन्तरिक्ष व समुद्र दोनों में समान गति से चलते थे। (1/180/1) उसके वे रथ अन्तरिक्ष और जल में चलते हैं तथा इन्हीं
के द्वारा अश्विनौ ने तुग्र के पुत्र को प्रचण्ड समुद्र की लहरों में फँसने की स्थिति में बचाकर बाहर निकाला था। (1/160/3) उनके ये विमान तीन धातुओं से निर्मित हैं, इनमें तीन व्यक्तियों के बैठने का स्थान है और ये पक्षी की भाँति आकाश में उड़ते हैं। इन्हें वे (अश्विनौ) तैयार करते हैं। (1/183/1)
इस प्रकार इन मंत्रों से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि अश्विनौ रथ कला (विमानन कला) में निपुण हैं। वे इन छोटे तीन लोगों के बैठने के स्थानों वाले धातु से निर्मित विमान की कला जानते हैं और उन्हें विमान चलाने की ऐसी कला ज्ञात है जिसके जरिये वे जल, थल और वायु में समान रूप से गति कर सकते हैं।
पाक कला
ऋग्वेद में आता है कि अन्न स्वास्थ्य दायक होना चाहिए। यह ओज, बल और पोषण देने वाला होना चाहिए। साथ ही अन्न ऐसा हो कि शरीर को दृढ़ता प्रदान करे। शरीर में कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों को सक्षम बना सके। उसे उद्दीपक होना चाहिए। गौ दुग्ध और जौ मिश्रण जिससे 'करम्भ' बनता है, वह भोजन ऐसा ही है यह बात ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के 187 वें सूक्त में आती है। इस प्रकार यहाँ 'पाक विज्ञान' से सम्बंधित प्राय: भोजन संबंधी कलाओं के बीज स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। साथ ही अन्य व्यंजन धानावन्त, अपूप आदि अन्न के पदार्थों का वर्णन ऋग्वेद (8/11/2) में है।
रोग निदान ( उपचार )
ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के सूक्त 191वें में ऋषि अगस्त्य ने यह स्पष्ट कहा है कि सूर्य की किरणें रोगाणुओं का नाश करती हैं। उनके आस-पास आश्रम में रहने वाली इक्कीस प्रकार की चिड़ियाँ ऐसी हैं जो विष को भोजन के रूप में ग्रहण कर लेती हैं। 'मधुका' नाम की ऐसी विद्या है जो विष के प्रभाव को नष्ट कर देती है। स्पष्ट है कि वैदिक काल में विष को दूर करने वाली जानकारियाँ थी। आयुर्वेद की कला का ज्ञान हो चुका था।
जल चिकित्सा
ऋग्वेद 10/163/1-6 में यक्षमा रोग दूर करने की विधि का वर्णन है ऋग्वेद के सूक्त 7/47/1-4 तक जल चिकित्सा का वर्णन हैं। ऋग्वेद के पाँचवें मण्डल में 78वां सूक्त 'गर्भ स्रावी उपनिषद' कहा जाता है, इसमें गर्भ को गिरने से बचाने का वर्णन है, उसकी रक्षा का प्रयत्न है।
वनस्पति ज्ञान
ऋग्वेद के दसवें मण्डल में 97वें सूक्त में 23वें मंत्र तक वनस्पतियों के गुण और साथ में जो जंगली जानवर अपने रोगों की औषधियाँ जानते हैं जैसे- वाराह और नकुल, सर्प और कुछ पक्षी उनकी भी चर्चा की गई है।
इसी प्रकार ऋग्वेद के सूक्त (10/145/2-3) में उत्तानपर्णी औषधि के गुणों का वर्णन है। यह स्पष्ट है कि ऋग्वेद में औषधि को पहचानने की कला तथा उसके उपयोग का ज्ञान हो चुका था।
ऋग्वेद (1/117/21) में आता है कि अश्विनी कुमारों ने सर्वप्रथम आर्यों को हल के द्वारा जोतने और बीज बोने की कला सिखलाई। ऋग्वेद में यह भी आता है कि औषधियाँ अर्थात् वनस्पति मानवीय सृष्टि से पूर्व उत्पन्न हुई है। (10/97/15) तथा (3/33/13)
ऋग्वेद (1/191/10) में चमड़े के बने हुए पात्र में मदिरा रखने की चर्चा है। इसी संदर्भ में यह भी कहा गया है कि अश्विनी कुमार चमड़े से बने पात्र में मधु रखते हैं।
ऋग्वेद (10/130/1) में 'प्रतिमा विज्ञान' या प्रतिमा निर्माण कला का संकेत मौजूद है। सूक्त (10/189/2) में प्राण विद्या का वर्णन है।
ऋग्वेद (6/74/1) में सात प्रकार के रत्नों को जानने एवं उनके वर्गीकरण की कला है।
ऋग्वेद (7/54/55) में भवन निर्माण की कला वर्णित है।
ऋग्वेद (10/39/13) (1/118/8) काल में गौ पालन के साथ पशुओं को दुधारु बनाने की कला का ज्ञान था।
ऋग्वेद के (2/32/04) में स्पष्ट रूप से उल्लेख आया है, जिसमें सुई के द्वारा अच्छी तरह से सिलाई करने की चर्चा है।
ऋग्वेद के अन्तर्गत श्री सूक्त (क्र.13) में कमल की माला का स्पष्ट उल्लेख है। इसका अर्थ यह है कि इस काल में माला बनाने की कला मौजूद थी। इसी प्रकार अश्विनी कुमारों के माला धारण करने का भी वर्णन मिलता है।
ऋग्वेद के सातवें मण्डल में वशिष्ठ जी का मंत्र 'त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिं पुष्टि वर्धनम्....।' से स्पष्ट है कि ऋग्वेद काल में सुगंध बनाने की कला का ज्ञान था।
ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के 164 वें सूक्त में 34 वें मंत्र में 'ब्रह्मोद्य' अर्थात् पहेली पूछी गई है। इसी तरह ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के सूक्त क्रमांक 161 के मंत्र 2 में भी पहेली का वर्णन है।
ऋग्वेद के समय 'साम गान विद्या' का अंगों सहित ज्ञान था, क्योंकि ऋग्वेद में आया है कि पुरुष मेधा के समय यज्ञ से साम उत्पन्न होगा।
तस्माद्य ज्ञात सर्व हुत: ऋच: सामानि जज्ञिरे।साम का अर्थ है अंगों के सहित मंत्रों का स्वर उच्चारण करना। जैमिनीय सूत्र के अनुसार गीति प्रधान मंत्र को ही साम कहते हैं- 'गीतिषु समाख्या।' बृहदारण्यकोपनिषद (1/3/22) जो शतपथ ब्राह्मण का भाग है, उसमें कहा गया है कि -'स' का अर्थ है 'ऋक्' और अम् का अर्थ है 'गान'।
इस प्रकार स्पष्ट है कि ऋग्वेद के समय सात स्वरों के माध्यम से 'गीतिका' का पूर्ण स्वरूप ज्ञात हो चुका था।

