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सामवेद

चारों वेदों में प्रत्येक वेद का अपना महत्त्व है, पर 'सामवेद' का अपना एक विशिष्ट स्थान है। यह विशिष्ट स्थान उसकी गेयात्मकता के कारण है। छान्दोग्य उपनिषद् में कहा है- वाणी का रस ऋचा और ऋचा का रस साम है तथा साम का रस उद्गीथ है-

वाच: ऋग्रसः ऋचः सामरसः साम्न उद्गीथोरसः।
(छा.उपनिषद.1/1/2)

उद्गीथ है ओंकार का गान, जो सामवेद का अविच्छिन्न अंग है। गीता में भी सामवेद के महत्त्व का वर्णन है। श्रीकृष्ण ने कहा है -वेदानाम् सामवेदोस्मि। (गीता.)

विचार करने पर स्पष्ट होता है कि भाषा कोई भी हो, अभिव्यक्ति के तीन ही विभाग हैं- गद्य, पद्य और गान। वैदिक परम्परा अनुसार यजुर्वेद में जो पादबद्ध मन्त्र ऋग्वेद से अथवा अथर्ववेद से लिए गये हैं, गद्य की तरह बोले जायेंगे, पद्य के समान नहीं। ऋग्वेद और अथर्ववेद में वे ही पद्य की तरह पढ़े जाने का विधान है, पर सामवेद में वे ही मन्त्र जब पढ़े जाते हैं तो एक विशिष्ट स्वर एवं लय के साथ ही पढ़े जाते हैं।

छान्दोग्य उपनिषद् में आता है- साम क्या है?

उत्तर है- ऋचा पर आधारित है साम- ऋचि तस्माद्च्यध्यूढं साम। (छा. उपनिषद 1/6/1)

साम की गति क्या है? का साम्रो गतिरिति स्वर इति होवाच। (छा. उपनिषद 1/8/4)

साम की गति है-स्वर। बृहदारण्यक उपनिषद अर्थात् शतपथ ब्राह्मण ने तो और भी स्पष्ट रूप से कहा गया है कि- सामवेद का स्वरूप आलाप है। (बृ. उप. 1/3/25)

वहीं व्युत्पत्ति भी बता दी है, कहा है- 'सा च अम श्रेति तत् साम्न: सामत्वम्' (बृह. उ. 1/3/22)

'सा' का अर्थ है 'ऋक्' और 'अम्' का अर्थ है- गान्धार (ग) आदि स्वर। अत: साम शब्द का अर्थ हुआ- ऋक् के साथ सम्बद्ध स्वर प्रधान गायन। जहाँ ऋग्वेद आदि केवल मन्त्र मय है, वहीं सामवेद मन्त्र और स्वर दोनों से संयुक्त है। इस कारण सामवेद का अपना विशिष्ट महत्त्व है। गीती तत्त्व स्वर में समाया हुआ ही होता है। बृहदारण्यक में इसी बात को कई बार दुहराया गया है। वेद के मन्त्र दृष्टा ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व यह अनुभूति कर ली थी कि रहस्यमय प्रयोगों के प्रभावपूर्णता के लिए सामान्य मन्त्रों की अपेक्षा अवतरंगों से युक्त मन्त्र गान अधिक प्रभावी होता है, इसीलिए उन्होंने कहा है- ईश्वर प्राप्ति के लिए भक्ति भावना के विकास में गायन का योगदान असाधारण है।

स्वरन्तित्वा सुते नरो वसो निरेक उक्थिन.....

अर्थात् हे शिष्य! तुम अपने आत्मिक उत्थान की इच्छा से मेरे पास आये हो। मैं तुम्हें ईश्वर का उपदेश देता हूँ। उसे तुम प्राप्त करने के लिए संगीत के साथ पुकारोगे तो वह तुम्हारे हदय की गुहा में प्रकट होकर अपना प्रेम प्रदान करेगा। (ऋ. 8/33/2)। स्पष्ट है कि आत्मा की उन्नति के लिए संगीत सबसे अच्छा साधन है। यह मन्त्र दृष्टा भी मानते थे, जानते थे और आज का विज्ञान भी संगीत के प्रभाव को स्वीकारता है। अत: सामवेद गायन होने से ही गीता में श्रीकृष्ण भगवान् ने कहा है- वेदानाम् सामवेदोस्मि। यज्ञ में देवताओं की प्रसन्नता के लिए सामवेद के मन्त्रों का गान करने वाले पुरोहित को 'उद्गाता' कहते हैं। उद्गाता के लिए ही सामवेद-संहिता का संग्रह किया गया है। उद्गाता जब सस्वर मन्त्रपाठ करता है, तब उन मन्त्रों में एक ऐसी विलक्षण शक्ति उत्पन्न हो जाती है कि मन्त्र अपना सर्वथा नवीन स्वरूप लेकर अधिक प्रभावी बन कर उपस्थित हो जाते हैं। ओंकार का गान प्रथम किया जाता है, इसे 'उद्गीथ' भी कहा जाता है। उद्गीथ साम गान का अविच्छिन्न अंग है। उपनिषद् मानती है कि -'वाणी का रस ऋचा तथा ऋचा का रस साम है और साम का उद्गीथ है'-

वाच: ऋग् रसः ऋचः साम रसः साम्न उद्गीथो रस रसः।
(छान्दो.उ.1/1/2)

आगे कहा है- वेदों का पुष्प सामवेद है- सामवेद एव पुष्पम्। (छा. 3/3/1)

पुष्प भले ही छोटा होता है, पर वृक्ष की सुरभि फैलाकर उसको सार्थकता प्रदान करता है।

वाणी और प्राण क्रमश: ऋक् और साम हैं, यथा- 'वाक् च प्राणश्च ऋक् च साम च' (छा. उ. 1/1/5) और 'वागेव सा प्राणोऽ मस्तत् साम' (छा. उ.1/7/1/) में यही बात कही गई है।

वेद मन्त्रों के गान की संज्ञा साम है। न केवल मन्त्र पाठ को ही साम माना जाता है और न सिर्फ गान को, बल्कि दोनों के मिश्रण को माना जाता है। 'साम' शब्द से हमें उन गानों को समझना चाहिए जो ऋचाओं पर भिन्न-भिन्न स्वरों में गाये जाते हैं। जिन ऋचाओं पर ये साम गाये जाते हैं, उनको (ऋचाओं को) सामयोनि कहते हैं। हम जिसे सामसंहिता कहते हैं, वह इन्हीं साम योनि ऋचाओं का संग्रह सामवेद के नाम से प्रसिद्ध है।

सामवेद के दो भाग हैं- पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक। आर्चिक अर्थात् गान। पूर्वार्चिक में छ: प्रपाठक (अध्याय) और उत्तरार्चिक में नौ प्रपाठक हैं।

पूर्वार्चिक के प्रथम प्रपाठक में अग्नि विषयक ऋक् मन्त्र, दूसरे से चौथे तक इन्द्र की स्तुति, पंचम में पवमान पर्व (सोम सम्बन्धी) ऋचाएँ संकलित हैं। छठवें को आरण्यक पर्व नाम दिया गया है, इसमें देवताओं की स्तुतियाँ अलग-अलग छन्दों में गायी गई हैं। इनमें से प्रथम से लेकर पंचम प्रपाठक तक को 'ग्राम गान' कहते हैं। छठवें की ऋचाएँ वन में भी गेय होने से 'अरण्य गान' कही जाती हैं। अन्त में परिशिष्ट रूप से 'महानाम्नी' ऋचाएँ दी गई हैं। इस तरह पूर्वार्चिक के मन्त्रों की संख्या 650 है। उत्तरार्चिक भाग में के नौ में से पाँच प्रपाठकों में प्रत्येक के दो-दो भाग हैं। इन्हें अर्घ (अध्याय) कहते हैं। अन्तिम चार प्रपाठकों के तीन-तीन अर्घ हैं। यह गणना राणायनी शाखा की है।

कौथुमी शाखा में प्रथम पाँच प्रपाठकों के 10 अध्याय तथा 6 से 8 इन तीन प्रपाठकों के 9 अध्याय तथा अन्तिम नौवें प्रपाठक के 2 अध्याय हैं, इस प्रकार कुल 21 (इक्कीस) अध्याय हैं। उत्तरार्चिक में 1225 (बारह सौ पच्चीस) मन्त्र हैं। अत: पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक दोनों के मिलाकर कुल मंत्रों की संख्या 1875 (अठारह सौ पचहत्तर) होती है। साम कलाएँ ऋग्वेद से ली गई, ऐसा कहा गया है, पर कुछ ऐसी भी हैं जो पूर्णत: भिन्न रूप में हैं। पूर्वार्चिक के 650 मन्त्रों में से 267 मन्त्र उत्तरार्चिक में फिर से लिए गए हैं। साथ ही 75 मन्त्र अधिक माने जाते हैं, पर वास्तविक संख्या अधिक है। नौ ऋचाएँ सर्वाधा नवीन है जो शायद ऋग्वेद की शाकल शाखा से अलग किसी दूसरी शाखा से लिए गए हैं। इस प्रकार ऋग्वेद की 1504। पुनरुक्त 267=1771 तथा 1771+99+ पुनरुक्त 5=1875 (अठारह सौ पचहत्तर) सामवेद की ऋचाएँ होती हैं; यह एक गणना है। स्वामी भगवताचार्य ने अपने 'साम संस्कार भाष्य' में गणना इस प्रकार दी है- कुल मन्त्र 1875। पूर्वार्चिक में 53 और उत्तरार्चिक के 43 मन्त्र तथा 01 मन्त्र महानाम्नी के कुल 97 मन्त्र। यहाँ ऋग्वेद के मंत्र नहीं हैं, अत: (1875-97=1778) ऋग्वेद के मंत्र हैं, पर इनमें 272 मन्त्र पुनरुक्त हैं। इस प्रकार 1506 मन्त्र ऋग्वेद के हैं। ऋग्वेद के पृथक 97 मन्त्र जो स्वरूप में अलग हैं, उनमें 9 पुनरुक्त है, वे ऋग्वेदीय हैं। अत: 88 मन्त्र अऋग्वेदीय हैं, इनमें 17 अथर्ववेद के मन्त्र हैं और 2 यजुर्वेद के हैं, इस प्रकार 69 (उनहत्तर) मन्त्र ही सामवेद के हैं।

सामवेद की शाखाएँ- वायु पुराण, श्रीमद्भागवत पुराण एवं विष्णु पुराण के अनुसार महर्षि वेदव्यास ने अपने शिष्य जैमिनि को सामवेद का अध्ययन कराया। जैमिनि ने सुमन्तु और सुमन्तु ने अपने पुत्र सुन्वान को पढ़ाया था। फिर सुन्वान् ने अपने पुत्र सुकर्मा को सामवेद की शिक्षा दी। सुकर्मा सामवेद के महान् आचार्य कहे गये। इनके दो प्रमुख शिष्य हुए- हिरण्यनाभ कौसल्य और पौष्यमिज आवन्त्य (अवन्ति देश के वासी)।

सामवेद की सहस्त्र शाखाएँ होने का श्रेय सुकर्मा आचार्य के इन दो शिष्यों को ही जाता है। व्याकरण महाभाष्य में महर्षि पतंजलि ने सामवेद को 'सहस्त्र वर्त्मा सामवेद' कहा है। प्रपंच हृदयं, आथर्वण परिशिष्ट चरण व्यूह सूत्र के अनुसार भी सामवेद की एक हजार शाखाएँ मानी गई हैं, किन्तु खेद है कि काल कवलित होने से आज वे मिलती नहीं है। आज केवल तीन शाखाएँ ही मिलती हैं। इनका संकेत प्राचीन प्राप्त ग्रन्थ 'चरण व्यूह सूत्र' के सामवेद खण्ड में उपलब्ध होता है, यथा- 'गुर्जर देशे कौथुमी प्रसिद्धा, कर्नाटके जैमिनीया प्रसिद्धा, महाराष्ट्र देशे राणायनीया प्रसिद्धा'- अर्थात् गुजरात में कौथुमी शाखा, कर्नाटक में जैमिनीय एवं महाराष्ट्र में राणायनीय शाखा प्रसिद्ध रही हैं।

कौथुमी शाखा- गुर्जर देश में प्रसिद्ध इस कौथुमी शाखा के प्रवर्तक आचार्य 'कुथुमि' थे। यह शाखा सामगान परम्परा में प्रतिनिधि शाखा है। वर्तमान में यह शाखा ही उपलब्ध शाखाओं में सबसे प्रामाणिक है। आचार्य शंकर ने भी इसी कौथुमी शाखा की ताण्ड्य और शाट्याथनी उपशाखाओं को अपने भाष्य में उल्लेख किया है। सायणाचार्य ने इसी शाखा पर भाष्य रचा है। सामवेद का प्रधान ताण्ड्य ब्राह्मण को पंचविंश ब्राह्मण या ताण्ड्य महाब्राह्मण भी कहा जाता है। इसी शाखा की 'छान्दोग्योपनिषद' भी है।

जैमिनीय शाखा - इस शाखा का क्षेत्र कर्नाटक रहा है। इसके प्रवर्तक वेदव्यास के तीसरे प्रधान शिष्य जैमिनि (जैमिनी) माने जाते हैं। जैमिनी मुनि युधिष्ठिर की सभा प्रवेश के समय उपस्थित थे। (महाभारत सभा.4/7) ये वत्स गोत्रोत्पन्न मुनि यज्ञ के 'उद्गाता' थे। जैमिनी ने अपने पुत्र सुमन्तु को और सुमन्तु ने अपने पुत्र सुमन्वान् को यह शाखा पढ़ायी थी। इसी वंश परम्परा में अन्तिम आचार्य सुकर्मा हुए, जिन्होंने एक सहस्त्र संहिताएँ, शाखाएँ या गायन की शैलियाँ निर्माण की थीं। ऐसा चरण व्यूह सूत्र सामवेद खण्ड में आया है। इसी शाखा के जैमिनीय ब्राह्मण, केनोपनिषद, जैमिनीय उपनिषद, जैमिनीय श्रौत सूत्र और जैमिनीय गृह्य सूत्र प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं।

राणायनीय शाखा- इसका प्रचार महाराष्ट्र में है। इस शाखा के प्रवर्त्तक वसिष्ट माने जाते हैं- 'राणायनो वसिष: राणिरन्य:' (शा.व्या.पृ.232)। आज इस शाखा की मूल पाठ की प्रामाणिक प्रति अप्राप्त है। ऐसा वेद के विद्वान भगवद्त्त जी मानते हैं। लेकिन अधिक विद्वान् विण्टरनिट्स स्टीवैन्शन द्वारा संपादित प्रति को ही मूल प्रति मानते हैं। शांकर भाष्य के ब्रह्मसूत्र में खिल पाठ और राणायनियों के उपनिषदों का उल्लेख है। अधिकांश काल के प्रवाह में इस शाखा का साहित्य संभवत: नष्ट हो गया है। हेमाद्रि आचार्य का मत है कि 'खादिर गृह्य सूत्र' इसी की उपशाखा का सूत्र है।

सामवेद की गानपद्धति- समस्त सामगान को चार भागों में बाँटा गया है- ग्रामगेय गान, आरण्यक गान, उफह गान एवं उफह्य गान।

1. ग्रामगेय ज्ञान- इसे ही प्रकृति गान कहते हैं। यह पूर्वार्चिक के प्रथम पाँच अध्यायों पर होता है।

2. आरण्यक गान- यह आरण्यक पर्व के निर्दिष्ट मन्त्रों पर होता है।

3. उफह गान और 4. उफह्य गान- केवल उत्तरार्चिक के निर्दिष्ट मन्त्रों पर ही होता है।

भारतीय संगीत का मूल इन्हीं सामगानों पर आधारित है। नारदीय शिक्षा के अनुसार सामगानों के स्वर इस प्रकार हैं- 7 स्वर, 3 ग्राम, 21 मूर्च्छना, 49 तान। इनमें से सात स्वरों की तुलना वेणु (बाँसुरी) के स्वरों से की है-

य: सामगानां प्रथम: स वेणोर्मध्यम: स्वर: यो द्वितीयो स गान्धार: तृतीय: तत् ऋषभ: स्मृत:। चतुर्थ षड्ज प्राह: पंचमो धवतो भवेत्। षष्ठो निषादो विज्ञैय: सप्तम: पंचम स्मृत:॥

अर्थात्- प्रथम - मध्यम/म, द्वितीय - गान्धार/ ग, तृतीय -ऋषभ / रे, चतुर्थ - षड्ज / सा, पंचम - धैवत / ध, षष्ठम् - निषाद / नि एवं सप्तम - पंचम / प।

सामवेद में सामयोनि मन्त्रों पर इन स्वरों को सूचित करने के लिए 1, 2, 3,......7 आदि अंक उस पर लिख दिये जाते हैं और उन मन्त्रों को सामगानों के रूप में ढालने के लिए अनेक संगीतानुकूल शाब्दिक परिवर्तन किये जाते हैं। इन परिवर्तनों को विकार कहते हैं-

1. विकार- शब्द का परिवर्तन- यथा अग्ने के स्थान पर ओग्नाथि।

2. विश्लेषण- एक पद का पृथककरण- यथा वीतये के स्थान पर वोयितोया 2 यि।

3. विकर्षण- एक स्वर का दीर्घकाल तक विभिन्न उच्चारण- यथा ये या 3 यि।

4. अभ्यास- किसी पद का बार-बार उच्चारण- यथा तोयायि का दो बार उच्चारण।

5. विराम- गायन में सुविधा के लिए किसी पद के बीच में ठहर जाना- यथा गृणानो हव्यदातये में ह पर विराम लेना।

6. स्तोभ- ओ, होवा, आउवा आदि गान के अनुकूल पद पढ़ना।

उदाहरण स्वरूप सामवेद के प्रथम मन्त्र में गान विपर्यय का रूप इस प्रकार होगा-

अग्न 1 2 आ 2 याहि 2 वीतये 3 7 2 गृणानो 2 3 हव्य 2 1 दातये 2 1 नि 1 होता 2 सत्सि बर्हिषि।
(सामवेद 1/1/1)

गौतम द्वारा गाया साम- इस प्रकार होगा।

1 ओग्नाई 1 आयाही 53 1 वोइतोया 52 इ 1 तोयाई 1 गृणानोह 1 व्यदातीयाई 1 तोयाइ 1 नाइ होता सा 3 1 त्साइ 1 वाऽओहोबा 1 हीषी।

सामवेद के ब्राह्मण मन्त्रों के अर्थ ज्ञान के लिए ब्राह्मण ग्रंथों के प्रवचन प्रस्तुत हुए हैं- 'मन्त्र: स ब्राह्मणा: प्रोक्ता: तदर्थ ब्राह्मणं स्मृतम् इसी प्रकार की परिभाषा भाष्यकार आचार्यों ने भी की है- 'ब्रह्मणों वेदानाम् श्मानि व्याख्यानानि ब्राह्मणानि'- अर्थात् ब्राह्मण ग्रंथ वेदों के व्याख्यान-ग्रंथ हैं। सामवेद के प्रमुख ब्राह्मण ग्रंथ जो प्राप्त हैं, वे हैं- ताण्ड्य ब्राह्मण, षड्विंश ब्राह्मण, साम विधान ब्राह्मण, आर्षेय ब्राह्मण, देवताध्याय ब्राह्मण, छान्दोग्योपनिषद् ब्राह्मण, संहितोपनिषद् ब्राह्मण और वंश ब्राह्मण।

यह सबसे प्रमुख ब्राह्मण ग्रन्थ है। ब्राह्मण ताण्ड्य को 25 अध्याय होने से पंचविंश ब्राह्मण भी कहा जाता है। यह 'ताण्डि' द्वारा रचा गया है। इसमें विशेषत: सोमयागों का वर्णन है। इसका प्रचार क्षेत्र नर्मदा का उत्तर भाग रहा है। इसमें अनेक आख्यायिका हैं- वत्स द्वारा गाये गये 'वात्स गान' के सम्बन्ध की अति प्रसिद्ध आख्यायिका है, जो इस प्रकार है- कण्व गोत्र के दो ऋषि वत्स और मेधातिथि थे। मेधातिथि ने एक वार वत्स को शूद्रपुत्र तथा अब्राह्मण कहकर अपमानित किया। फिर वे ब्राह्मणत्व के लिए निर्णय के अग्नि के पास गये। मेधातिथि ने सामगान 'मेधातिथ्य साम' रूप में किया, फिर अग्नि में प्रवेश किया, परन्तु अग्नि ने उनको छुआ भी नहीं। फिर 'वत्स' ने 'वात्स साम' पढ़कर अग्नि में प्रवेश किया तो अग्नि ने उन्हें भी नहीं छुआ और ब्राह्मणत्व सिद्ध हुआ। मेधातिथि ने वत्स को इस प्रकार ब्राह्मण स्वीकार किया। (ताण्ड. 14/6/6)

यह ग्रंथ कौथुमी शाखा का है। इसमें मात्र छ: अध्याय हैं। यह ताण्डय ब्राह्मण से जुड़ा हुआ है। ताण्डय 25 वें अध्याय पर समास होता है। माना जाता है कि उसके आगे 26 वें अध्याय से यह शुरू होता है, इसीलिए इसे षड्विंश ब्राह्मण अर्थात् 26 वें अध्याय से आरंभ होने वाला ब्राह्मण-ग्रंथ कहा जाता है। इसके भी लगभग वही विषय वर्णित हैं जिनको ताण्ड्य ब्राह्मण में प्रारंभ किया गया है, जैसे- 'इहलोक, परलोक, स्तोम, ऋक्क, यजु, साम वेदत्रयी विद्या तथा विद्युत् अग्नि आदि प्राकृतिक पदार्थों, प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान आदि का उल्लेख मिलना।' इस पर आचार्य सायण का भाष्य उपलब्ध है।

इस ब्राह्मण ग्रंथ में स्वाभाविक रूप से घटने वाली घटनाओं से भिन्न अद्भुत घटनाओं जैसे आकस्मिक रूप से घोड़ों हाथियों की अधिक तादाद में मौत होना, मकानों पर वज्रपात होना, प्रशासनिक अधिकारियों में कलह बढ़ना आदि का वर्णन और इनसे निपटने के स्मार्त यागों का विधान तथा सामों का विनियोग भी दिया गया है।

सामवेद के प्रमुख ब्राह्मणों में इसका स्थान है। इसमें 3 प्रपाठक और 25 अनुवाक हैं। इसके प्रथम प्रपाठक की कथा में बताया है कि सृष्टि क्रम में ब्रह्मा ने अपनी सन्ततियों के आहार के रूप में सामों की परिकल्पना की थी जो साम के सात स्वरों से तृप्त होती थी जैसे- क्रूष्ट, प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, मन्द्र और अतिस्वार-इन सात स्वरों से क्रमश: देवों, मानवों, पशुओं-पक्षियों, गन्धवों-असुरों-सुरों, अप्सराओं, पितृगणों एवं पूरे स्थावर-जंगमात्मक पदार्थों के तृप्त होने का उल्लेख है। यह आज भी अप्रासंगिक नहीं है। इसके साथ ही इसमें कृच्छादि व्रत, सर्वकाम प्राप्ति साधन, प्रायश्चित्त विधान, आरोग्यकाम, आयुकाम, विविध रोग और उनका शमन आदि इसकी विषय वस्तु है। इस पर श्रीभरत स्वामी और आचार्य सायण द्वारा किये गये भाष्य उपलब्ध हैं।

इसमें छ: अध्याय हैं। यह मन्त्रदृष्टा ऋषि के नाम से सामों का नाम बताता है, इसलिए इस ब्राह्मण ग्रंथ का नाम 'आर्षेय ब्राह्मण' है। यह सामवेद की आर्षानुक्रमणी का ज्ञान कराने में अति उपयोगी है। इसकी सूत्रात्मक शैली है। यह अग्नि, इन्द्र, पवमान, अर्क, द्वन्द्व तथा वाचोव्रत पर विशिष्ट प्रकाश डालता है। इस पर आचार्य सायण का भाष्य उपलब्ध है।

यह चार खण्डों में बँटा हुआ है। प्रथम खण्ड में साम देवताओं में से अग्नि, प्रजापति, इन्द्र, सोम, त्वष्टा, अंगिरस, पूषा, सरस्वती आदि देवताओं के स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है। द्वितीय खण्ड में छन्द, देवता, ऋषि एवं वर्णों का वर्णन है। तृतीय में निरुक्तियाँ, निर्वचन विषयों का वर्णन तथा चौथे खण्ड में सावित्री (गायत्री) के स्वरूप पर विस्तार से विचार किया गया है।

इसमें दस प्रपाठक हैं। प्रथम दो विवाह आदि कर्म से सम्बद्ध है। इसमें कर्मकाण्डों, पितरों के सम्बन्ध में प्रकाश डाला है। शेष आठ प्रपाठक 'छान्दोग्य उपनिषद्' के रूप में है। उपनिषद् साम के सार तत्त्व के रूप स्वर को मानता है और सामगान महत्त्व का विस्तार से वर्णन करता है। इस पर भी आचार्य सायण का भाष्य उपलब्ध है।

यह ब्राह्मण पाँच खण्डों में विभक्त है। इसकी शैली सूत्रात्मक है एवं यह साम गायन के स्वरूप और उसके फल की चर्चा करता है अर्थात् सामसंहिता का गूढ़ रहस्य खोलता है। इस ग्रंथ में विधि, स्तोम, अनुलोम-प्रतिलोम आदि स्वरों का सुविस्तृत चित्रांकन हुआ है। इस ब्राह्मण ग्रंथ पर आचार्य सायण का वेदार्थ-प्रकाश भाष्य एवं पं. द्विजवाज भट्ट कृत भाष्य उपलब्ध है।

यह तीन खण्डों में विभाजित है। यह सामवेदीय आचार्यों की परम्परा को विस्तार-वर्ण प्रदान करता है। इसमें शर्वदत्त गार्ग्य से लेकर ब्रह्म पर्यन्त सामवेद की अध्ययन परम्परा कही गयी है। इस पर मात्र आचार्य सायण का भाष्य उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त जैमिनीय शाखा के तीन ब्राह्मण ग्रंथ उपलब्ध हैं- जैमिनीय आर्षेय ब्राह्मण, जैमिनीयोपनिषद् ब्राह्मण एवं जैमिनीय ब्राह्मण।

पाँच अध्यायों वाला सूत्र रूप में अपने विषयों को प्रतिपादन करने वाला महत्त्वपूर्ण शाखा ग्रन्थ है। इस पर किसी का भाष्य उपलब्ध नहीं हैं।

चार अध्यायों में विभक्त यह भी जैमिनीय शाखा का महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है, जिसमें गायत्री का विस्तृत वर्णन है, अत: गायत्र्युपनिषद भी कहा जाता है। गहरे अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि प्राचीन काल में तवलकार ऋषि के नाम पर इस शाखा का नाम 'तवलकार शाखा' था, अत: इसे 'तवलकार ब्राह्मण' भी कहते हैं। इसमें अष्टाक्षरा, द्वादशाक्षरा एवं चतुविंशत्यक्षरा गायत्री, स्वर्ग, अपवर्ग, ऋक्क, साम, सविता और सावित्री का विस्तार से प्राणमाहात्म्य चिरन्तन मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में वर्णित है। अनेक दार्शनिक ऐतिहासिक गाथाएँ चिन्तन की पृष्ठभूमि में प्रस्तुत हुई हैं।

यह जैमिनीय शाखा का प्रधान ग्रन्थ है। यह तीन भागों में विभक्त सामवेदीय ब्राह्मणों में एक बड़ा ब्राह्मण ग्रंथ है। कष्ट की बात यह है कि एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ होते हुए भी किसी आचार्य की इस पर भाष्य उपलब्ध नहीं है। कुछ दिनों पूर्व ही डॉ. रघुवीर ने अनेक पाण्डुलिपियों की खोज कर उनके आधार पर इसका संस्करण तैयार करवाया है। इसमें वर्णित विषयों की सूची अति विस्तृत है। इसमें नैमित्तिक यज्ञों का विधान है, प्राणोत्पत्ति है, प्रजासृष्टि मनस् आदि इन्द्रियों का सृजन एवं दार्शनिक धरातल के मूल विषय उल्लिखित हैं तथा पशु-पक्षियों की सृष्टि का वर्णन है। एकाक्षरा वाक्, ओम्, नक्षत्रों आदि का विचार तथा तैंतीस कोटि के प्रमुख देवों के पारस्परिक सम्बन्धों पर विचार भी इसमें किया गया है। इसमें वर्णित रहस्यात्मक विषयों पर आज अनुसन्धान की अति आवश्यकता है।