विद् धातु से बना शब्द है। शब्द कोश में विद् धातु जानने के अर्थ में है अर्थात् जिससे जाना जाए। जानने का साधन। जिसे जाना-जाना चाहिए और जो जानते का साधन हो, वह विद्या है। शैव मत के अनुसार शिल्प स्वयं विद्येश्वर है और शिल्प ही जानने का साधन है। वही वेद है और वही वेद्य। शिव ही वेद्य और वेदक हैं। वे ही जानने का साधन। उनका रूप स्वयंभू है। इसीलिए सृष्टि का जो जाल है, वह सब शिव है। शिव विद्या है।
विद्या अर्थात् जानना। अपने स्वरूप में जब पूर्णरूपेण व्यक्त होती है, तब स्वयं सुन्दर हो जाती है। परब्रह्म स्वयं के स्वरूप में होते हैं। इसलिए शैवधर्म मानता है कि- शिवरूपी विद्या के वर्णन में जितना सौन्दर्य की अभिव्यक्ति अधिक होगी, वह उतना ही भाग कलात्मक होता है। शैव मतानुसार रमणीयता कलात्मकता सापेक्ष होती है। वही सौन्दर्य है जो आपस में जोड़ सके। राग का अर्थ भी है आसक्ति अर्थात् जोड़कर रख सके, इसीलिए मायाशक्ति सबको जोड़कर रखती है। यह शक्ति का कार्य है। यही माया कला है तथा वही कला का मूल है। इसीलिए जो ब्रह्म था, वह माया स्वरूप में सृष्टि रूप में, ज्ञान रूप में परिवर्तित हो गया और इसी परिवर्तित रूप में जगत में अपने आप को व्यक्त किया है।
अब यह ज्ञान यहाँ है। यह अपने भाग (खण्ड) अनुसार एक-दूसरे से अव्यक्त होते हैं। अर्थात् अपना भाग करके फिर जुड़ता है तो उसमें अंश और अंशी एक-दूसरे से जुड़ते हैं, लेकिन उन्हें ज्ञात रहता है कि मैं अंशी हूँ और मैं ही अंश हूँ। अंशी विद्या है और अंश कला।
अंशी स्वरूप विद्याओं को ही भारतीय मनीषा चौदह रूपों में देखती है। ये प्रमुखत: चौदह विद्यायें है जिन्हें भारतीय दर्शन ज्ञान मार्ग का प्रथम सौपान मानता है।
भारतीय संस्कृति में विद्या और कला के बिना ज्ञान का साक्षात्कार सम्भव ही नहीं है। तब प्रशन उठता है कि ये कला और विद्या क्या हैं?
दार्शनिक दृष्टि से देखे तो विद्या और कला एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। विद्या जो मूलत: ज्ञान है जिसके बिना किसी भी कार्य को अथवा सृष्टि से किया जाना सम्भव नहीं अर्थात् विद्या प्रकाश है। वहीं दूसरी ओर कला उसी ज्ञान का क्रियात्मक स्वरूप है।
इसे समझने के लिए हम कहें कि विद्या वह ज्ञान है जिसके द्वारा हम अपने स्वरूप बोध का दर्शन कर सकते हैं। इसे ही कहा-'सा विद्या या विमुक्तये' अर्थात् विद्या भवसागर के बन्धन से मुक्त करती है।
दूसरा सौपान कलाएँ हैं जो ज्ञान के प्रकाशमान स्वरूप को क्रियात्मकता प्रदान कर परमानन्द परम चैतन्य के आनंद की यत् किञ्चित अभिव्यक्ति करती हुई ज्ञान के उस प्रकाश में स्वयं को लीन कर असीमता प्राप्त कर लेती हैं।
इन कलाओं को भारतीय मनीषा तीन काल खण्डों में अलग-अलग दृष्टियों से देखती है।
पहला काल जिसकी दृष्टि कला के केन्द्र और परिधि के मध्य संतुलन बनाने में कुशल होती थी, वह काल वैदिक काल जो अथर्ववेद की दृष्टि के सापेक्ष्य जीवन की बारीकियों पर केन्द्रित थी। दूसरा काल जिसको तांत्रिक काल कहा जा सकता है, इसमें कला मानव जीवन में पेचीदगी पूर्ण गूढ़ गुणतीय आकृतियों के रूप में दृष्टिगोचर हुई। कला की ये कृतियाँ जो तांत्रिक गूढ़ होकर कलाकृति को कन्द्र से हटाकर परिधि परक दृष्टि रखती हैं, भाव व्यञ्जना की बारीकियों पर केन्द्रित होकर अभिव्यत होती रही हैं। कला की तीसरी दृष्टि गुप्तकाल में दिखाई दी, जो केन्द्र परक दृष्टि होती थी। इस बात को इस प्रकार कहा जा सकता है कि वर्ण रेखा तथा भाव इन तीनों बातों पर विशेष रूप से कलाकार की दृष्टि केन्द्रित रहती थी। मानव जीवन की सर्वोत्तम कृतियाँ इसी समय निर्मित हुई। गुप्तकाल भारतीय कलाओं को उत्तम कृतियों से समृद्ध करने का काल रहा है।
इस प्रकार विद्या और कला दोनों भारतीय दर्शन को अपने-अपने ज्ञान और क्रियात्मक रूप से सम्पन्न करती हुई जीवन साधना को प्रकाश एवं विभिन्न इन्द्रधनुषी रंगों से अलंकृत करती हैं।
वर्तमान युग में कलाओं का स्वरूप उपरोक्त तीनों कालों तथा दृष्टियों का परिवर्धित तथा परिष्कृत स्वरूप दृष्टिगत होता है, जिनमें पूर्वकाल के प्रवाह का रस तो है, किन्तु कलाकार की दृष्टि विद्या और कला को समग्र रूप से एकीकृत कर प्रस्तुत करने की दिशा में प्रगतिशील दिखाई देती है।
'शिक्षा' उस विद्या का नाम है जो वेद के मंत्रों तथा ऋचाओं के उच्चारण की विधि सिखाती है। 'व्याकरण' विद्या शब्द साधन की
प्रक्रिया बताता है और निरुक्त वह शास्त्र है जिसे आधुनिक भाषा में 'भाषा-विज्ञान शास्त्र' कह सकते हैं। इस प्रकार से हम देखते हैं कि ये तीन अंग- शिक्षा, व्याकरण और निरुक्त परस्पर संबंधित विद्याएँ हैं। मंत्रों के ठीक-ठीक उच्चारण के लिए शिक्षा का ज्ञान आवश्यक है। मंत्रों में आये शब्दों के स्वरूप और उनकी व्युत्पत्ति ज्ञान के लिए व्याकरण शास्त्र का ज्ञान जरूरी है तथा मंत्रों के शब्दों के निर्वचन, निरुत्ति तथा देवता के ज्ञान के लिए निरुक्त शास्त्र के ज्ञान की आवश्यकता है। इन तीनों शास्त्रों के बीज ऋग्वेद में प्राप्त होते हैं।
बीभत्सूनां सयुजं हंसमाहु: अपां दिव्यानां सख्ये चरन्तम्।
अनुष्टुभमनु चर्चूर्यमाणम् इन्दं निचिक्यु: कवयो मनीषा।।अग्ने: गायत्री अभवत् सयुग्वा उष्णिहया सवितासंबभूव।
अनुष्टुभा सोम उक्थै: महस्वान् बृहस्पते: बृहती वाचमावत्।।बृहस्पते प्रथमं वाचो अग्रंयत् प्रैरत नामधेयं दधाना:।
यदेषां श्रेष्ठं यदरिप्रमासीत् प्रेणा तदेषां निहितं गुहाविः।।उपरोक्त तीनों वेद मंत्र उदाहरण के रूप में दिए हुए हैं। इनमें संकेत के द्वारा प्रथम मंत्र में 'शिक्षा विद्या' का बीज है। दूसरे मंत्र में 'निरुक्त विद्या' और 'छन्द विद्या' दोनों का संयोग बताया है, जिस अनुसार जहाँ 'गायत्री छन्द' होगा, उसका देवता 'अग्नि' होगा, जहाँ 'उष्णिक छन्द' होगा, उसका देवता 'सवित' होगा। जहाँ 'सोम' देवता होगा, उसका छंद 'अनुष्टुप' और इसी प्रकार 'बृहती छन्द' का देवता 'बृहस्पति' होगा। ये सब वहाँ होगे जहाँ देवता का नाम या स्वरूप स्पष्ट न होता हो। तीसरे मंत्र में व्याकरण के विभिन्न अंगों के नाम आदि का संकेत से विधान किया गया है। हम देखते हैं कि छन्द, व्याकरण, निरुक्त और शिक्षा इन चारों अंगों के बीज ऋग्वेद में मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त ऋग्वेद के अंग 'ऐतरेय ब्राह्मण', 'कौषीतकि ब्राह्मण' आदि में भी इन विधाओं के संकेत और बीज प्राप्त होते हैं।

