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सूत्रक्रीड़ा

धागों का खेल

हाथ में सूत्र लेकर नालिका या अंगुल विन्यास से पशु–पक्षी आदि की आकृति बनाना सूत्रक्रीड़ा कहलाती है।

नालिकासंचारनालादिसूत्रणामन्यथान्यथा दर्शनम् । छित्त्वा दग्ध्वा च फनरच्छित्वा दर्शनम् तच्चांगुलिन्यासात् ।।

सूत्रक्रीड़ा का अर्थ है– धागे से खेलना। श्रीकृष्ण जब संदीपनि गुरु के यहाँ गये तो वहाँ गुरु ने कृष्ण और बलराम का पहले उपनयन कर्म कराया, क्योंकि उस काल में किसी को भी वेदाध्ययन करने के पूर्व यज्ञ–सूत्र धारण करना होता था। प्राचीन खुदाई से प्राप्त जो ऋषियों की मूर्तियाँ मिली हैं, उसमें से एक ऋषि अगस्त्य की प्रतिमा है, जो ललितपुर जिले के देवगढ़ संग्रहालय में देखी जा सकती है। इस मूर्ति में ऋषि अगस्त्य को यज्ञ सूत्र पहने दिखाया गया है। यह यज्ञ–सूत्र एक पट्टे के रूप में है। लगता है कि यह पट्टा उस समय उर्ण से बनता होगा। इस प्रकार ये अनुश्रुति उस काल के ग्रंथों पर आधारित है कि श्रीकृष्ण का यज्ञोपवीत हुआ था। उन्होंने वेद के विषय में उसके उच्चारण एवं उसके प्रतिपाद्य विषय का जो गंभीर वर्णन भागवत पुराण ( 11/21/35–41) में किया है, स्पष्ट रूप से सूचित करता है कि श्रीकृष्ण यज्ञ–सूत्र अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में धारण करते थे। अनेक परोक्ष रूप के वर्णन श्रीमद्भागवत् में ब्रह्मवैवर्त पुराण में है, जिनसे यह सूचित होता है कि इस कला को जाने बिना श्रीकृष्ण को ऐसा वस्त्रों का ज्ञान हो ही नहीं सकता। अत: कहा जा सकता है कि श्रीकृष्ण इस कला में निपुण थे। गर्ग संहिता में भी इसका उल्लेख हुआ है।

सूचीवान कर्म में सबसे महत्त्वपूर्ण बात है कि स्वदेशी अभिप्राय और अलंकरणों का उपयोग होता है।