शैली की दृष्टि से वेद के मंत्रों का विभाजन तीन भागों में हुआ है। छन्दों में निबद्ध मंत्रों का नाम ऋग्वेद, गद्यात्मक मंत्र समुदाय 'यजुर्वेद' और गान के आधार पर चुने हुए मंत्रों का संग्रह 'सामवेद' माना जाता है। निरुक्तकार यास्क ने यजु: शब्द को 'यज' धातु से निष्पन्न माना है। (निरुक्त- 7/20) जिसका भाव यह है कि- यजुर्वेद से यज्ञ का स्वरूप निर्धारित होता है, इसीलिए समस्त वैदिक साहित्य में यजुर्वेद अपना विशिष्ट स्थान रखता है। मनुष्य जीवन के विकास की तीन सीढ़ियाँ हैं- ज्ञान, कर्म और उपासना। इनमें कर्म की सीढ़ी अर्थात् कर्मकाण्ड का प्रतिपादक स्रोत भारत में यजुर्वेद है। यद्यपि कर्मकाण्ड का दूसरे वेदों में भी स्थान है तो भी प्रधान आधार 'यजुर्वेद' ही माना जा सकता है। यज्ञ की सारी 'इति कर्त्तव्यता' को यजुर्वेद ही बतलाता है। अत: याज्ञिक दृष्टि से यजुर्वेद का दूसरा नाम 'अध्वर्य वेद' है, क्योंकि यज्ञ को चलाने वाला 'ऋत्विक' कहा जाता है।
यजुर्वेद के दो भाग हैं- शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद। दोनों में प्रतिपाद्य विषय की दृष्टि से शुक्ल यजुर्वेद की ही प्रधानता है, इसी का दूसरा नाम 'वाजसनेयी संहिता' प्रसिद्ध है। शुक्ल यजुर्वेद में चालीस अध्याय हैं, जिसमें से उन्तालीस अध्यायों में वैदिक कर्मकाण्ड का वर्णन है। प्रथम और द्वितीय अध्याय में 'दर्श पूर्ण मास' तथा 'पितृ यज्ञ' का वर्णन है। तीसरे अध्याय में 'अग्निहोत्र, चातुर्मास्य मंत्रों का संकलन है। चार से आठवें अध्यायों में 'सोम' संस्थाओं का तथा 'अग्निष्टोम' का वर्णन है। नौवें और दशवें अध्यायों में 'राजसूय' और 'वाजपेयी' यज्ञ का वर्णन है। ग्यारहवें से अठारहवें अध्यायों में 'अग्नि चयन' का विवरण है। उन्नीसवें से इक्कीसवें अध्यायों में 'सौत्रमणि यज्ञ' का वर्णन है तथा बाइसवें से पच्चीसवें अध्याय में 'अश्वमेध यज्ञ' की प्रक्रिया का वर्णन है। छब्बीसवें से उन्तीसवें अध्याय तक 'खिल मंत्रों का संग्रह है। तीसवें में 'पुरुष मेध', इक्कीसवें में 'पुरुष सूक्त' और बत्तीसवें तथा तैंतीसवें में सर्व मेध यज्ञों के मंत्रों का संकलन है। चौंतीसवें में 'शिव संकल्प', पैंतीसवें में 'पितृ मेध' तथा छत्तीसवें से उन्तालीसवें तक 'प्रवर्ग्य विषयक' मंत्र हैं। चालीसवें अध्याय में ईशावास्योपनिषद का उपदेश है। यह ईशावास्योपनिषद् सभी उपनिषदों में प्रथम मानी जाती है।
वैदिक मंत्रों की व्याख्या निरुक्त के अनुसार तीन आधारों पर की जा सकती है। प्रत्येक मंत्र की व्याख्या आधि भौतिक, आदि- दैविक (अधि यज्ञ) और आध्यात्मिक दृष्टि से की जा सकती है। इसी तरह यजुर्वेद की व्याख्या अधियज्ञ दृष्टिकोण से की जा सकती है। शतपथ ब्राह्मण के प्राचीन व्याख्याकारों का यही मत है कि यजुर्वेद का मुख्य विषय 'अधियज्ञ' है। इसी दृष्टि से परमार्थ और परम् पद की प्राप्ति का प्रतिपादन करता है। अधियज्ञ दृष्टि समझने के लिए 'कर्मकाण्ड के विकास' को समझने की आवश्यकता है। 'यज्ञ' और 'यजु:' दोनों शब्दों का विकास 'यज्' धातु से हुआ है। यह धातु देवपूजा, संगति करण और दान इन तीन अर्थों में प्रयुक्त होती है। याज्ञिक दृष्टि अर्थात् वैदिक कर्मकाण्ड का विकास इन्हीं तीनों शब्दों पर निर्भर है।
अग्नि, आदित्य, वायु आदि देवता एक ही परमात्म तत्त्व की विभूतियाँ हैं। (यजु. 32/1)। इन्हीं देव शक्तियों की पूजा, स्तुति, गुणगान देवताओं के साथ संगति करण प्रारम्भिक रूप में होता है। इसके बाद सत्कार और फिर 'इदं अग्नये इदं न मम्' की भावना दान का आधार हैं, इस प्रकार कर्मकाण्ड होता है। अज्ञान से प्रकाश की ओर बढ़ते हुए साधक उन्नति करता है। (यजु. 20/21) उत्तरोत्तर उन्नति करते हुए मनुष्य 'स्वराज्य ज्योतिर्मय लोक' की ओर बढ़ता है। यही स्वर्ग है। इसकी प्राप्ति साधक करना चाहता है। यही मानव का चरम विकास है और यजुर्वेद का लक्ष्य है।
समष्टि भावना
यजुर्वेद में समष्टि की भावना प्रधान है। वैदिक प्रार्थनाओं में पहली विशेषता यह है कि वे प्राय: बहुवचन में होती हैं जैसे- 'अग्नेनय सुपथा राये अस्मान्........।' (यजु.5/36) अर्थात् हे अग्नि देव! हम सबको सत् मार्ग पर चलने की प्रेरणा दीजिए। इसी प्रकार गायत्री मंत्र में 'धियो यो न: प्रचोदयात्। (यजु. 3/35) अर्थात् 'हम सब की बुद्धि को प्रेरणा दें।' ऐसी ही अनेक प्रार्थनाओं में, मनुष्य के सामने ऋषियों ने 'समष्टि भावना' का उच्च आदर्श रखा है।
भद्र भावना
यजुर्वेद के मंत्रों में वर्णित कर्मकाण्ड की विशेषता है कि उसमें दु:ख-सुख की भावना से ऊपर उठकर कल्याण प्राप्ति के लिए बार-बार प्रार्थना की जाती है। जैसे- 'यद् भद्रं तन्न आसुव' (यजु. 30/03) अर्थात् जो कल्याण कारक हो, वही हमें प्राप्त करायें। इसी प्रकार संकल्प सूक्त में बार-बार कहा है- 'तन्मे मन: शिव संकल्पं मस्तु।' अर्थात् मेरे मन में कल्याणकारी संकल्प दृढ़ होवें। आदि अनेक प्रार्थनाएँ भद्र भावना के उदहारण हैं।
आशावाद
यजुर्वेद के धर्माचरण का मूल सिद्धान्त है- 'मा भे: मा संविक्था: ।' (यजु. 1/23) अर्थात् हम न तो भयभीत हों और न उद्विग्न हों।
तेजोसि तेजो मयि धेहि। (यजु. 19/9) अर्थात् तेजोनिधान परमात्मान! हमको तेजस्वी बनाइये।
अश्मा भवतु नस्तन:। (यजु. 29/49) अर्थात् हमारा स्वास्थ, शरीर, पत्थर के समान दृढ़ हो।
विश्व बंधुत्व की भावना
यजुर्वेद में विश्व बंधुत्व की भावना से परिपूर्ण अनेक प्रार्थनाएँ हैं। एक स्थान पर कहा गया है कि हम सब प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखें। (यजु. 36/8) और दूसरे स्थान पर कहा है कि हमारे राष्ट्र में 'ब्राह्मण ब्रह्म वर्चस्व' से युक्त हो। हमारे राष्ट्र में शासक वीर हों। धरती धन-धान्य से पूर्ण हो। मेद्य समय से वर्षा करें। (यजु. 22/22)
यजुर्वेद के अन्तिम अध्याय (40 वाँ) में कर्म योग का बीज रूप में उपदेश दिया है -'कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा:'। एवं 'त्वयि नान्यथे तोस्ति न कर्म लिप्यते नरे'। (यजु. 40/2) अर्थात् मनुष्य को कर्त्तव्य कर्मों को करते हुए सौ वर्षों तक जीने की इच्छा करना चाहिए। कर्म बंधन से बचने का यही उपाय है। इसी अध्याय में आगे कहा गया है कि- 'जो मनुष्य अपने में सबको और सबमें अपने को देखता है, वह मिथ्याज्ञान में फँसता नहीं है। जो मनुष्य समस्त प्राणियों में एकात्म दर्शन करता है ऐसे व्यक्ति को न मोह होता है, न शोक होता है। इस प्रकार यजुर्वेद 'एकात्म दर्शन' के द्वारा शोक मोह आदि समस्त मन के विकारों को दूर करके मनुष्य के जीवन के परम लक्ष्य 'पुरुषार्थ' की प्राप्ति का उपदेश देता है।
शुक्ल यजुर्वेदीय ब्राह्मण
शुक्ल यजुर्वेद का ही ब्राह्मण ग्रंथ 'शतपथ ब्राह्मण' प्राप्त होता है। इसमें यज्ञों के विविध रूपों और अनुष्ठानों का परिपूर्णता के साथ निरूपण किया गया है। आध्यात्मिक दृष्टि से यज्ञों के स्वरूप निरूपण का श्रेय 'शतपथ ब्राह्मण' को ही प्राप्त है। शतपथ ब्राह्मण में यज्ञ मीमांसा का प्रारम्भ हविर्यागों से किया गया है, जिनका आधार अग्निहोत्र है। अग्नि होत्री को अग्नि मृत्यु के पश्चात् भी नष्ट नहीं करता हैं, अपितु पिता-माता के समान अग्नि उसे नवीन जन्म देता है। अग्नि, अग्निहोत्रियों को स्वर्ग ले जाने वाली नाव के समान है। (शत. ब्रा. 2/3/15)। शतपथ 'यज्ञ' को जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण कर्म कहता है- यज्ञोवै श्रेष्ठतं कर्म (1/7/3/5)। इसके अनुसार यह जगत अग्नि-सोमात्मक है। सोम अन्न है और अग्नि अन्नाद है। अग्नि रूपी अन्नाद सोम रूपी अन्न की आहुति ग्रहण करता है, यही क्रिया जगत में सतत् विद्यमान है।
'शतपथ' में यज्ञ के छोटे से छोटे विधि-विधानों का भी विशद वर्णन है। क्रियाओं के लिए हेतु निर्देशन करने को आख्यायिकाओं का यथास्थान निवेश और उनका सरस विवेचन इस ब्राह्मण ग्रंथ के उत्कर्ष बतलाने का पर्याप्त कारण है। इसमें सौ अध्याय हैं, इसलिए इसे 'शतपथ' कहा जाता है। शुक्ल यजुर्वेद के इस शतपथ ब्राह्मण का चौदहवाँ काण्ड 'बृहदारण्यक उपनिषद' कहा जाता है। इस अरण्यक या
उपनिषद का मुख्य विषय यज्ञ नहीं है] अपितु यज्ञों के भीतर विद्यमान आध्यात्मिक तथ्यों की मीमांसा है। शुक्ल यजुर्वेद का चालीसवाँ अध्याय 'ईशावास्योपनिषद' है। इस प्रकार शुक्ल यजुर्वेद के दो उपनिषद ग्रंथ हैं- ईशावास्योपनिषद और बृहदाण्यकोपनिषद।
शुक्ल यजुर्वेद कल्प ग्रंथों के श्रौत सूत्रों में से उपलब्ध एकमात्र श्रौत सूत्र का नाम -'कात्यायन श्रौत सूत्र' है। यह श्रौत यागों का संक्षिप्त और सुव्यवस्थित क्रमबद्ध प्रतिपादन है। इसमें छब्बीस अध्याय हैं। इसमें प्रथम अध्याय में प्रतिपादित पदार्थों के नामों की परिभाषा दी गई है। दूसरे और तीसरे अध्याय में दर्श पूर्णमास का निरूपण है।
चौथे अध्याय में पितृ यज्ञ आदि तथा अग्नि होत्र का निरूपण है। पाँचवें अध्याय में 'मित्र विन्दु' इष्ट, छठवें में पशुबंध तथा सातवें से ग्यारहवें तक 'सोमयाग' का वर्णन है। बारहवें और तेरहवें में 'गवामयन', चौदहवें में बाजपेई और पन्दरहवें में राजसूय यज्ञ का वर्णन है। सोलहवें से लेकर अठारहवें तक 'अग्नि चयन' का विवरण है। उन्नीसवें, बीसवें एवं इक्कीसवें में सौत्रमणी, अश्वमेध, पुरुषमेध, सर्वमेध, पितृमेध, इन यज्ञों का वर्णन है। बाइसवें, तेईसवें एवं चौबीसवें एकाह: अहीनयाग, सत्रयाग और प्राक्षित विषय का वर्णन करते हुए छब्बीसवें अध्याय में 'प्रवर्ग्य प्रतिपादन' करते हुए ग्रंथ सम्पन्न हुआ है।
यह वर्णन विस्तृत इसलिए किया है क्योंकि इन वर्णनों में अनेक विद्याओं और कलाओं के बीज प्राप्त होते हैं। यजुर्वेद के समय लगभग सभी विद्याओं का ज्ञान ऋषियों को हो चुका था। शुक्ल यजुर्वेद का शिक्षा संबंधी ग्रंथ महर्षि याज्ञवल्क्य ने रचा जिसे 'याज्ञवल्क्य शिक्षा' कहते हैं, इसे शुक्ल यजुर्वेद का परिशिष्ट भी कहा जाता है।
इसी प्रकार ऋषि कात्यायन का रचा हुआ ग्रंथ 'शुल्ब सूत्र' प्रकाशित है, जिसमें गणित संबंधी विशेष रूप से ज्यामिति विषय का वर्णन है। ऋषि ने यज्ञ कुण्डों के निर्माण के लिए भूमिति, विज्ञान और गणित का विवेचन किया है। कात्यायन ऋषि ने ही यजुर्वेद के 'व्याकरण प्रतिशाख्य ग्रंथ' जिसे 'वाजसनेयी प्रतिशाख्य' कहते हैं, इममें वर्ण, स्वर, संधि, पद पाठ और क्रम पाठ का विचार किया है। इसी प्रकार शुक्ल यजुर्वेद के गणित, व्याकरण शिक्षा और निरुक्त के ग्रंथ भी प्राप्त होते हैं, जिससे यह प्रमाणित होता है कि उस काल में इन विद्याओं की बहुमुखी उन्नति हो चुकी थी।
कृष्ण यजुर्वेद
कृष्ण यजुर्वेद की चार शाखाएँ हैं, मुख्य तौर पर दो शाखाएँ प्रचलित हैं, शेष दो शाखाएँ 'कठ शाखा' तथा 'कपिष्ठल शाखा' प्राप्त नहीं हो रही हैं, इसलिए हम केवल दो शाखा का वर्णन करेंगे। इन शाखाओं में शुक्ल यजुर्वेद संहिता से इतना ही भेद है कि मंत्र, ब्राह्मण और आरण्यक कृष्ण यजुर्वेद में साथ-साथ पढ़े जाते हैं।
तैत्तिरीय संहिता
महाराष्ट्र प्रांत, आंध्र, द्रविड़ प्रदेश इसी शाखा के अनुयायी हैं, इस शाखा के ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद, श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र, ये सभी प्राप्त होते हैं।
कृष्ण यजुर्वेद का तैत्तिरीय ब्राह्मण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह ग्रंथ अत्यन्त विस्तृत है तथा ज्ञान की अनेक विधाओं से युक्त है। इस पर आचार्य सायण ने विस्तृत व्याख्या लिखी है। इस शाखा का आरण्यक तैत्तिरीय आरण्यक है।
तैत्तिरीय उपनिषद इसी शाखा की उपनिषद है। इसके अलावा कठ शाखा की कठोपनिषद एवं श्वेताश्वतर उपनिषद कृष्ण यजुर्वेदीय हैं।
कृष्ण यजुर्वेद का शिक्षा संबंधी ग्रंथ तैत्तिरीय शाखा के अन्तर्गत- 'भरद्वाज शिक्षा' है और प्रातिशाख्य -'तैत्तिरीय प्रातिशाख्य' नाम से प्रसिद्ध है।
कृष्ण यजुर्वेद के तीन 'धर्मसूत्र' हैं- बौधायन, आपस्तम्ब और मानव धर्मसूत्र।
कृष्ण यजुर्वेद के गृह्य सूत्र पाँच हैं- बौधायन, आपस्तम्ब, सत्याषाढ, मानव और काठक।
कृष्ण यजुर्वेद का जो तैत्तिरीय ब्राह्मण है, वह कई दृष्टियों से सांस्कृतिक, भाषिक, राजनैतिक और वैज्ञानिक विवेचन की अपेक्षा रखता है। इसमें अग्न्याधान, ग्वामयन, बाजपेई, नक्षत्र-इष्टि और राजसु यागों का वर्णन प्रथम काण्ड में हैं। दूसरे काण्ड में अग्निहोत्रा, श्रौत्रामणी, बृहस्पत्ति सब आदि का निरुपण है। तीसरे में नक्षत्र-इष्टियों और पुरुष मेध का विवरण है। इसके अतिरिक्त भारद्वाज, प्रहलाद, नचिकेता और अगस्त्य की विषद आख्यायिकाएँ भी हैं। सत्यभाषण, वाणी की मधुरता, तपोमय जीवन, अतिथि सत्कार, संगठन शीलता, दान सम्पति का परोपकार के लिए विनियोग ब्रह्मचर्य पालन आचार्य दर्शन तथा सृष्टि विषयक वर्णन है। इसमें अनेक विद्याओं-कलाओं के संकेत या वर्णन तथा पुराणों के आख्यानों के बीज स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं।
तैत्तिरीय ब्राह्मण का एक भाग तैतिरीय उपनिषद् है।
'कृष्ण यजुर्वेद मैत्रायणी संहिता' यह दूसरी शाखा का प्रमुख ग्रंथ है, इसमें कृष्ण यजुर्वेद की संहिता के समान ही मंत्र और ब्राह्मणों का मिश्रण है। इस संहिता में चार काण्ड हैं। चौवन प्रपाठक, छ: सौ चौवन अनुवादक और तीन हजार एक सौ चवालीस कंडिकाएँ है।
मैत्रायणी शाखा के विषय
इसमें दशपूर्णमास इष्टि, गृह-ग्रहण उपस्थापन, अग्न्याधान, अग्निहोत्र, चतुर्मास्य, बाजपेई, आम्यस्त्रियाँ, राजसु, अग्निचिति सौत्रमणी और अश्वमेध यज्ञों का विवेचन है।
मैत्रायणी संहिता में कुछ ऐसे विषयों का विवेचन है जो अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं होते, जैसे-'गौनामिक प्रकरण (4/2) में गाय के विभिन्न नामों का उल्लेख करते हुए उसकी महिमा का विवेचन किया है।
मैत्रायणी संहिता का ही उपनिषद कठोपनिषद् और श्वेताश्वतरोपनिषद है।
दुर्लभ 'शाखाकठ' का थोड़ा-सा वर्णन ब्रह्म पुराण के पचासवें अध्याय में वर्णित है। (गोदामाहात्म्य) इसके अनुसार कठ शाखा का मूल गोदा नामक नदी के दक्षिण में अग्नि कोण का क्षेत्र था। पतंजलि ने अपने महाभाष्य में कहा है कि 'प्राचीन काल में कठ शाखा का प्रचार गाँव-गाँव में था, इसी शाखा की संहिता का नाम काठक संहिता है। चौथी शाखा कपिष्ठल शाखा पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं है, । जबकि कठ शाखा उपलब्ध है। आचार्य बल्देव प्रसाद उपाध्याय ने अपनी पुस्तक 'वैदिक साहित्य और संस्कृति' में बताया है कि- कपिष्ठल शाखा की एक अधूरी प्रति वाराणसी के संस्कृत विश्वविद्यालय के सरस्वती भवन में उपलब्ध होती है।
कृष्ण यजुर्वेद के अंगों में कलाओं के संकेत एवं बीज
कृष्ण यजुर्वेद के अंगों में कलाओं के संकेत बीज रूप में उपलब्ध होते हैं। कृष्ण यजुर्वेद तैत्तिरीय संहिता के अन्तर्गत तैत्तिरीय ब्राह्मण और तैत्तिरीय उपनिषद श्वेताश्वतरोपनिषद प्रसिद्ध प्रमुख ग्रंथ अंग है। स्वयं तैत्तिरीय संहिता में भाषा की व्याख्या विस्तार से की गई है।
तैत्तिरीय आरण्यक तैत्तिरीय ब्राह्मण का एक भाग है जो स्वयं अति विस्तृत है। यह दस विभागों में अर्थात् प्रपाठकों में बँटा है, यह ग्रंथ प्रपाठक, अनुवाद और कण्डिकाओं में विभाजित किया गया है। सम्पूर्ण तैत्तिरीय आरण्यक में दस प्रपाठक हैं। प्रथम में बत्तीस अनुवाक है, दूसरे में बीस, तीसरे में उन्नीस, चौथे में व्यालीस ,पाँचवे-छठवें सातवें में क्रमश: बारह-बारह तथा आठवें में नौ और नौवें प्रपाठक में दस अनुवाक हैं। इस प्रकार एक सौ अड़सठ अनुवाक नौ प्रपाठकों में है। दसवें में अनुवाकों की संख्या प्रदेशों के अनुसार अलग-अलग प्राप्त होती है। जैसे- द्रविड़ शाखा में चौंसठ अनुवाक, आन्ध्र शाखा में आठ, कर्नाटकों की शाखा में इक्यासी अनुवाक हैं। इस प्रकार यह तैत्तिरीय आरण्यक पूर्ण होता है। इसके सात अनुवाक मुख्य रूप से आरण्यक हैं और शेष तीन अनुवाक ब्रह्मज्ञान या ब्रह्मविद्या प्रधान होने के कारण 'उपनिषद्' कहे जाते हैं। 'बाररूणीय' उपनिषद इनका प्राचीन नाम है। इसके बाद दसवें अनुवाक का परिशिष्ट भाग 'नारायणीय' उपनिषद् के नाम से अलग जाना जाता है। जो वैष्णवों में अति सम्माननीय माना जाता है। 'तैत्तिरीय आरण्यक' इतना महत्वपूर्ण ग्रंथ है कि- इसके पाँच मंत्र जो 'पंचब्रह्म' के नाम से प्रसिद्ध हैं, इस आरण्यक के 10,43,44,45,46 और 47 वें अनुवाक में वर्णित हैं। उन्हीं के आधार पर 'लकुलीश का पाशुपत धर्म' जो आज भी दक्षिण में हजारों व्यक्तियों द्वारा माना जाता है, वे अपने को 'वीरशैव' कहते हैं।
इस आरण्यक में कृषि की कला से संबंधित भूमि को ठीक प्रकार से जोतना और जोतने के लिए तीव्र नोक वाला लोहे का हल बनाना यह सब कलाएँ उस समय प्रचलित हैं, इसके संकेत हैं (10/16/6-7)। इसी आरण्यक में 'वृक्ष आयुर्वेद और औषधि ज्ञान से संबधित विधाएँ लोगों को उस समय ज्ञात थी' इसके संकेत हैं। (5/2/6) तथा (4/11/08)। उस समय स्मरण शक्ति को तीव्र करने की विद्या का ज्ञान था,
इसका वर्णन इसी आरण्यक के नारायणीय उपनिषद् में 8,9,10 वें अनुवाकों में है। उस समय अन्न का सुरक्षित भण्डारण करने की कला लोगों को ज्ञात थी।
मैत्रायणी शाखा की उपनिषद् जो मैत्रायणी उपनिषद कही जाती है। इस उपनिषद् में अनेक कलाओं के संकेत व्यक्त हुए हैं जैसे- लोहार गिरि का वर्णन सूक्त (3/3) में है, कुम्हार गिरि अर्थात् चाक पर बर्तन बनाने की कला का वर्णन सूक्त क्र. (3/4) में है। एक ही कण्डिका में सुरा बनाने, इन्द्र जाल करने, नट की कला का वर्णन तथा भित्ति चित्रों का अंकन अर्थात् भित्ति कला का उल्लेख इस उपनिषद में चतुर्थ प्रपाठक के दूसरे अनुवाक में है।

