कामसूत्र के अनुसार– 'तुंडुलकुसुम वलिविकार कला' की व्याख्या इस प्रकार है–
अखण्ड तण्डुलै नाना वर्णै: सरस्वती भवने ।
काम भवने व मणि कुट्टि मेषु भक्ति विकाराः ॥
तथा कुसुमैर्नाना वर्णैग्रथितै: शिवलिंगादि पूजार्थं भक्ति विकासः ।तंडुलकुसुम वलिविकार का अर्थ है– विभिन्न रंगों के बिना टूटे चावल से सरस्वती भवन या काम भवन में मणियों से बने फर्श पर विभिन्न तरह की संरचनाएँ बनाना। पूजा के लिए चावल तथा रंग–बिरंगे फूलों को सजाना। मृगलोचना, तीर्थ मृत्तिका, दूर्वा, किसलय आदि माँगलिक पूजन साम्रगी एकत्रित करना। श्रीकृष्ण इस कला में भी अत्यन्त निपुण थे। ब्रह्मवैवर्त पुराण में उत्तरार्द्ध के 71वें अध्याय के अन्तर्गत जब श्रीकृष्ण कंश के यज्ञ में भाग लेने के लिए मथुरा की यात्रा के लिए निकले, उस समय का वर्णन करते हुए वेदव्यास जी लिखते हैं कि–
फलपल्लव संयुक्तं संस्कृतं चन्दनादिभि: ।
वामे कृत्वा पूर्ण कुम्भं वह्निं विप्रं स्वदक्षिणे ॥7 ॥पतिपुत्रवतीं दीपं दर्पणं पुरतस्तथा ।
दूर्वाकाण्डं च सुस्निग्धं पुष्पं धान्यं सितं शुभम ॥8 ॥गुरुदत्तं गृहीत्वा च प्रदधौ मस्तकोपरि ।
घृतं ददर्श माध्वीकं रजतं काञ्चनं दधि ॥9 ॥चन्दनं लेपन कृत्वा पुष्पमालां गले ददौ ।
गुरुवर्गं ब्राह्मणं च वन्दयामास भक्तित: ॥10 ॥उस दिन श्रीकृष्ण रात्रि के चौथे पहर में ही उठ बैठे और उन्होंने शुद्ध होकर गाय के गोबर से लिपे हुए स्थान पर बैठकर अपने वामभाग में जल से भरा हुआ कलश रखवाया जो फल–पल्लव से युक्त था, चन्दनादि से सुसंस्कृत था, अग्नि और ब्राह्मण दक्षिण ओर तथा सामने दीपक, सध्वा स्त्री एवं दपर्ण था। श्रीकृष्ण ने गुरु प्रदत्त दूर्वा काण्ड, पुष्प, शुभ श्वेत धान्य मस्तक पर धारण किया। रजत, स्वर्ण, घी, दही, आसव आदि का दर्शन किया, फिर चन्दन का लेप किया।

