कामसूत्र के अनुसार विशेषकच्छेद्य कला की व्याख्या इस प्रकार है–
विशेषकस्तिलको यो ललाटे दीयते,
तस्य भूर्जादिपत्रमय स्यानेक प्रकारं छेदनं छेद्यम् ।
पत्राच्छेद्यमिति वक्तण्यम् ।
वश्यति च पत्रच्छेद्यानि नासाभिप्राया कृतीनि प्रेषयेत ।
विशेषकग्रहण मादरार्थम् ।
विलासिनी नामति प्रियत्वात् ।।विशेषकच्छेद्य का अभिप्राय है– तिलक रचना, भोजपत्र आदि पत्तों की आकृति में काटना। इसलिए यह पत्रा छेद्य भी कहलाता है। नाक जैसी आकृति के भी पत्राच्छेद्य बनते हैं। आदर प्रकट करने के लिए विशेषक कहते हैं। यह विलासिनियों का अत्यन्त प्रिय श्रँगार है।
संस्कृत नाटकों में स्त्रियों के मुख पर की गई इस चित्रकारी का उल्लेख मिलता है। कस्तूरी, अगरु, चन्दन आदि से तिलक रचना और तिलक का आकार बनाने के लिए भोजपत्र आदि को काटकर छेद्य या खाके बनाने की यह कला है। स्त्रियों के माथे पर सिन्दूर का टीका और पुरुषों के माथे पर त्रिपुण्ड आदि इसके अन्तर्गत आते हैं। ललाट पर कुछ फल गोरोचन का टीका लगाने की परम्परा इसी के अन्तर्गत थी। प्राचीन काल में इसे कला का रूप मान्य किया गया है। श्रीमद्भागवत में विशेषकच्छेद्य कला का वर्णन दशम स्कन्द पूर्वार्द्ध के नवें अध्याय के प्रारम्भ में मिलता है। वह चित्र महर्षि व्यास ने अपनी प्रतिभा की आँखों से देखा है।
श्रीकृष्ण कंश के द्वारा आयोजित यज्ञ उत्सव में पधारने के लिए मथुरा नगरी के राजमार्ग पर ग्वालों के साथ जा रहे हैं। वे देखते हैं कि एक अत्यन्त तरुण सुमुखी कुब्जा, हाथ में चन्दन का प्याला लिए हुए जा रही है। वे पूछते हैं– हे सुन्दरी ! तू कौन है? हे अंगना ! यह चन्दन किसके लिए है? हमें ठीक ठीक बता, जो तू हमें यह उत्तम चन्दन लगा दोगी तो तुम्हारा तुरन्त ही कल्याण होगा।
दास्यस्म्यहं सुन्दर कंस सम्मता त्रिवक्रनामा ह्यनुलेय कर्मिण ।
मद्घावितं भोजपतेरतिप्रियं विनायुवां कोऽन्यतमस्त दर्हति ॥3 ॥रूप पेशल माधुर्य हसितालापवीक्षितै: ।
धर्षितात्मा ददौ सान्द्रमुभयो रनु लेपनम् ॥4 ॥ततस्ताव ङ्गरागेण स्ववर्णे तरशो भिना ।
सम्प्रास पर भागेन शुशुभातेऽनुरञ्जितौ ॥5 ॥कुब्जा कहती है– कि मैं त्रिवक्रा कंश की दासी हूँ। मेरा बनाया हुआ यह लेपन चन्दन महाराज कंश को अति प्रिय है। सुन्दर पुरुष तुम्हारे अतिरिक्त इस चन्दन का अधिकारी कौन हो सकता है? रूप, सुकुमारता, माधुर्य, हँसी, आलाप और तिरछी दृष्टि से मोहित होकर उस कुब्जा सुन्दरी ने वह सुगंधित अनुलेपन उनको प्रदान किया। वह पीले रंग वाला चन्दन उस सुन्दरी ने उनके नाभि से ऊपर लेपन किया। भगवान का शरीर चन्दन चर्चित होकर और भी सुन्दर कान्ति फैलाने लगा।
भगवान वेदव्यास ने ब्रह्मवैवर्त पुराण के उतरार्द्ध में अध्याय 69 में श्रीराधा और श्रीकृष्ण की क्रीड़ा का वर्णन करते हुए लिखा है– कि एक बार श्रीकृष्ण ने राधा का श्रँगार करते हुए राधा की माँग में सिन्दूर लगाया। राधा के कपोलों पर चन्दन के बिन्दुओं से युक्त अनार के फल के आकार में अनेक प्रकार के चित्र–विचित्र पद्मक चिन्हों की रचना की। इस प्रकार श्रीकृष्ण विशेषकच्छेद्य कला के भी पूर्ण मर्मज्ञ थे।
सिन्दूरं च ददौ तस्या: सीमन्ताध: स्थलेऽमले ।
दाडिमी कुसुमाकारं युक्तं चन्दन बिन्दुभि: ॥चकार पद्मकं गंड़े नानाचित्र विचित्रकं ।
द दौ तत् पादपद्मेच रत्न मंञ्जीर रञ्जितम् ॥
